
रेखा हजारिका, लखीमपुर
रेगिस्तान की मृगतृष्णा के पीछे
भागते-भागते
मैं अपना ही रास्ता खो बैठी हूँ।
हे बादल,
एक बार बरस जाओ,
कि मेरे तन की तपिश शांत हो,
और मन को
थोड़ा-सा सुकून मिल जाए।
बहुत दूर आ गई हूँ
प्यास और प्रतीक्षा के सफ़र में,
जहाँ हर चमकती उम्मीद
सिर्फ़ एक छलावा बनकर रह गई।
मेरे दिल में अब
खुशियों का कोई दीप नहीं जलता,
सीना जैसे
अनगिनत दरारों से भर गया है।
प्रिय समय,
क्या कभी ऐसा भी होगा
कि तुम लौटकर
मेरे हिस्से की मुस्कान ले आओ?
मेरे हृदय का कमल
अब पहले-सा नहीं खिलता,
वह चुपचाप
अपनी ही पीड़ा की झील में
मुरझाया-सा ठहरा है।
फिर भी कहीं न कहीं
एक बूंद बारिश की आस बाकी है,
कि शायद किसी दिन
बादलों की दया से
यह सूखा मन फिर से हरियाली ओढ़ ले।
