
अनामिका सिन्हा पाठक ‘अर्श ‘
हाँ, मैंने भी की है मुहब्बत,
निभाई है इश्क़ की रवायत।
खुद को मिटाया, तब यह राज़ खुला—
खुदा ही हूँ मैं,
यही है रस्म-ए-उल्फ़त।
इश्क़ में डूबे हैं दोनों जहाँ,
ज़मीं भी और आसमान भी।
मीरा की बगावत है इश्क़,
राधा की इबादत है इश्क़।
इश्क़ है, तो हम हैं, तुम हो;
खुदा की सबसे बड़ी इनायत है इश्क़।
खुशनसीब हैं वे,
जिनके दिलों में मुहब्बत के फूल खिलते हैं।
जो रूह को रूह से रूबरू करा दे,
वही करिश्माई एहसास है इश्क़।
शुक्राने में गुज़र रही है ज़िंदगी,
या रब! तेरी बड़ी मेहरबानी है।
सुनो ज़रा…
अपनी गीता, कुरान, बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब
बाहर ही रखकर दाखिल होना
मुहब्बत के मयखाने में।
यहाँ दीवानों को नशा है अनंत का,
यहाँ प्रेम ही
सबसे बड़ी पंडिताई की निशानी है।
