
चेतना सिंह, पुत्री- श्री शुभ नारायण सिंह; छपरा (बिहार)
नारी, तुम नारायणी हो,
जीवन की निर्झर बहता पानी हो।
पैरों में पिता की बंदिशें,
पति के लिए समर्पित जवानी हो।
माँ बनकर वात्सल्य-प्रेम,
ईश्वर की दी वरदानी हो।
न डर किसी का, न अहित किसी का,
प्रकृति की अद्भुत कहानी हो।
न थकी कभी, न झुकी कभी,
सृष्टि की अद्भुत सियानी हो।
भरोसा तुम, विश्वास भी तुम,
पर्वत-सी अटल, चट्टानी हो।
सुनो, नारी! तुम नारायणी हो…।

बेहद उम्दा 👌🏻👌🏻