
डॉ. किरण सरावगी
मेरे आज के किरदार से पहले भी एक किरदार हुआ करता था मैं।
आज तक बीता हुआ वह शख़्स फिर कभी नहीं आया।
वक़्त के साथ-साथ बह रहा है
जीवन,
मुट्ठियों में क़ैद नहीं हो रहा।
चाहे गुनाह का घटित होना हो
या न्याय का अभाव हो,
तो भी
प्रवाह के संसर्ग से उपजी
मनोभाव की वेदना का चरम उत्कर्ष,
पराकाष्ठा के छोर तक
जिजीविषा के मोह का भंग न होना
किरदार ही है।
बहरूपियों के
आचमन के दृढ़ संकल्प
को कौन आगे बढ़कर लेगा
अपनी अँजुरी में?
गौमुखी कमंडल की धार
सीना चीर रही है,
वह किरदार है।
उफनते सागर में
अपनी परछाई का
ज़िक्र कर सकेगा,
या फिर किसी वेग से
आवेग छिन जाएगा
और साहिल से किनारों की तरफ़
रुख़ कर लेगा।
जौहर क्या
किनारों के संगठन को अंगूठा दिखाना है?
ख़ुद को
आत्महत्या
शब्द से परे
एक दूसरा विकल्प है, जो
नया नहीं है।
रोज़मर्रा की तरह
सुकून
से
शेष रह गया।
शेष से परे।
