हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।