सांवला रंग

भगवती सक्सेना गौड़

दरवाजे पर कोई था, जाकर रीना ने जल्दी से देखा।
सामने महिमा पुलिस की वर्दी पहने खड़ी थी, आई.पी.एस का बैच लगाए।
रीना ने खुश होकर कहा, “वाह, तुम कब आयी?”

“कल ही आयी हूँ, होली मम्मी पापा के साथ मनाने आयी हूँ।”

“बैठो, अभी मैंने गर्म गुझिया बनाई है, तुम्हे खिलाती हूँ।”

थोड़ी देर में वो चली गयी और मेरे मन मे अतीत के रंग बिखेर गयी।

मेरी सहेली सीमा सांवले रंग की थी, बचपन से उसने बहुत तिरस्कार सहा था, पर ईश्वर की लीला अपरंपार है, वो जानता है, मनुष्य की रचना में बैलेंस कैसे करना है, तो उसने सीमा को बहुत तीक्ष्ण बुद्धि की बनाया और वो स्नातक के बाद ही गणित की शिक्षिका बन गयी, उसके मां,पापा रिश्तों के लिए कई वर्ष परेशान रहे। एकाएक एक सुदर्शन युवक ने रंग को परे कर उंसकी विलक्षण बुद्धि को परखा और सीमा की शादी हो गयी।

सालभर बाद ही वो अस्पताल में थी, डॉक्टर ने उसको होश आने पर बताया, “लक्ष्मी आई है, झूले में सो रही है।”

जल्दी से सीमा ने उत्सुकता से पूछा, “मुझे दिखाइए, गोरी है या सांवली?”

डॉक्टर ने घूर कर उसे देखा, “ये कैसा सवाल है, वैसे मैं दिखा रही हूं।”

लड़की सांवली थी, एक माँ अपने जीवन को याद करके दुखी हो रही थी, फिर मन मे गांठ बांधी, इसको मैं एक सफल मुकाम तक पहुँचाऊंगी, जब तक जीवित रहूंगी कोई इसके रंग पर तंज न कर पायेगा।

अब सीमा और उसके श्रीमानजी की तीस सालों की मेहनत रंग लाई और उनकी बेटी आज आई.पी.एस अफसर बनकर उनके गर्व का कारण बनी। आज पूरे शहर में चर्चा थी, ये एक पुलिस अफसर के मम्मी पापा है, कितने भाग्यवान है। आज कोई भी महिमा के रंग की चर्चा नहीं कर रहा था।

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