
मधु मिश्रा
अम्मा, क्या हमारा भी इस बिल्डिंग में घर नहीं हो सकता?”
बंटी के प्रश्न में उत्सुकता के साथ एक प्रबल इच्छा भी थी।
“नहीं बेटा, इसके लिए बहुत सारे रुपयों की ज़रूरत होगी। हम कहाँ से लाएँगे…? चल, भात बन गया है। पहले इसे खा ले, फिर रात में आराम से बात करेंगे।”
अम्मा ने बंटी को बहलाने की कोशिश की।
“नहीं अम्मा, मुझे अभी बताओ कितना रुपया लगेगा? मैं कमाऊँगा!”
बंटी की आवाज़ में अब रोष भी शामिल हो गया था।
“कुछ हुआ है क्या रे? बता, तुझे किसी ने कुछ कहा क्या?”
“अम्मा, वो सामने वाली नई बिल्डिंग कितनी सुंदर है ना… मैं तो बस उसे देख रहा था। उसके गेट और दीवार पर लगी चमकदार टाइल्स पर मेरे हाथ फिसल रहे थे। तभी वहाँ एक बड़ी-सी कार रुकी। उसमें से ड्राइवर भैया उतरे और तेज़ी से मेरी ओर आए। उन्होंने मेरी बाँह कसकर पकड़ ली और गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारते हुए बोले—
‘चोर कहीं का… कैसे भीतर घुसूँ, यही सोच रहा था ना!’”
यह कहते हुए गर्म लावे की तरह आँसू बंटी की आँखों के कोनों से बह निकले। लेकिन उन्हें पोंछने के बजाय वह बार-बार अम्मा से यही पूछ रहा था.
“घर कैसे बनता है…? रुपये कैसे कमाए जाते हैं…?”
अम्मा सिर झुकाए बुदबुदाने लगी—
“स्वाभिमान तो हर किसी का हो सकता है बेटा। सोचने के लिए कोई दीवार नहीं होती। लेकिन जब आसमान छूने की बात हो, तो कमज़ोर इंसान के हाथों का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी होता है।”
इन रचनाओं को भी पढ़ें-
साइकिल, सपने और मिल रोड
सब साथ हैं… फिर भी अकेले
देश संग खड़े रहो
लम्हा
संतुष्ट मुस्कान

सुरेश जी मेरी रचना प्रकाशन के लिए आपको हृदय से आभार 🙏💐🙂
बहुत अच्छी कहानी मधु जी 👌🙏