जिजीविषा

भारी बारिश और बाढ़ के बीच नदी किनारे खड़ा एक गरीब ग्रामीण व्यक्ति, दूर झोपड़ी की ओर देखते हुए भावुक और चिंतित मुद्रा में।

मौसमी चंद्रा, पटना

भादो की काली रात। घुप्प अंधेरा! धाराधर(बादल) जैसे अपना एक-एक बूंद निचोड़ने पर आमादा थे। फूस की छत तेज़ बारिश के आगे बेबस हो आँसू बहा रही थी।

मंगरु!फ़टी धोती,नंगे बदन कभी झोपड़ी से निकल रिरियाती आँखों से आसमान देखता, कभी कोसी नदी का तेज कोलाहल सुनता।
उसने अपनी पत्नी परबतिया और बिटिया को देखा।जो माँ की फटी साड़ी को ओढ़े सो रही थी।बदन आधा गीला ,आधा सूखा।मंगरु के सीने में करील चुभने लगे।

वो सोचने लगा।कभी यहीं बारिश तपती जमीन पर गिरकर मिट्टी की सौंधी महक बिखेरती तो वो बौरा जाता!जम कर भींगता।आज काले बादल देखकर हाड़ गोड़ कांप जाते है।

कोसी नदी से सटा भौवा परवल पंचायत का बिंदटोली गांव! जहां के लोग हर बरसात के पहले ईंटा पत्थर को भी ईश्वर समझ कर पूजने लगते–

“हे प्रभु रक्षा करना कोसी माई के कहर से।”

हर साल कितनों को लील जाती ये नदी।गांव के गांव बलि चढ़ जाते।
“ई साल फेन कोसी खतरे के निशान से ऊपर हय”।
सुबह कही बुद्धन चचा की ये बात सोचकर ही मंगरु सहम गया।
अभागा गरीब करे भी तो क्या करे?
फ़टी धोती,दबी-कुचली आत्मा,धंसा पेट और टपकती मड़ैया!इतनी ही सम्पत्ति थी।ऊपर से एक हाथ फालिज!मानो घाव पर किसी ने एक मुट्ठी नमक बुरक दिया।
पहले दो जून खिलाने की ताकत थी पर इस फ़ालिज ने कहीं का नहीं छोड़ा।
यहाँ पानी से मरेगा बाहर भूख से!
एक तरह बरसात!औऱ दूसरी तरफ कोसी का उफान! दोनों जोरों पर था।
मंगरु जानता था कि परबतिया उसके खातिर सब माँ-बाप घर दुआर छोड़ कर ई गांव में बस गयी है।अपने पसन्द के लड़के से ब्याह करने की कुछ तो कीमत चुकानी थी।नहीं तो क्या कमी थी उसमें।
पर पिछले साल इस लकवे ने कहीं का नहीं छोड़ा।
साल भर से जैसे-तैसे दोनों मिलकर घर चला रहे थे।पर ये बाढ़!इससे कैसे लड़ें?
मंगरु ने घूम कर एक बार परबतिया को देखा।
नहीं अब नहीं!ये कोसी मैया मेरे परिवार की बलि ले उससे पहले कुछ करना होगा।
वो झोपड़ी से निकला और बेतहाशा नदी की तरफ दौड़ पड़ा।फिसलन भरे मग पर पैर जमा चलता रहा…
नदी किनारे पहुँच, एक बार पीछे पलटकर गांव की तरफ देखा …नीचे कोसी का चौड़ा पाट शोर मचाता हुआ..उसने आँखे बंद की..दो बूंद टपके और..एक क्षण जोर का उबाल हुआ मन में!
छलाँग लगाऊं और… हो जाऊं मुक्त सब झंझटों से!
पर यकायक पैर जम गए।आँखों के सामने परबतिया और बिटिया का चेहरा घूम गया।उसने अपने दोनों हाथों को देखा।
एक लाचार है तो दूसरे में तो दम है! मुट्ठी भिंच गयी।
कुछ भी हो जाये वो हार नहीं मानेगा।अकेला नहीं छोड़ेगा अपनी परबतिया को।

उसने अपने आँसुओं को पोंछा और तेज़ कदमों से वापस लौटने लगा।सुबह उसे अपने परिवार को लेकर निकलना जो था।कोसी की इस दहशत से दूर.. बहुत दूर..।

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