सजल

प्रेम और विरह में डूबी एक महिला की भावुक प्रतीक्षा को दर्शाती यथार्थवादी छवि।

ममता जाट, टोंक

प्रेम पथ पे मैं जब से ख़डी हूँ,
रोज तन्हाइयों से लड़ी हूँ।

देख आकर जरा पास तेरी,
याद में कैसे बेसुध पड़ी हूँ।

मुझको कहता था दिल का नगीना,
तेरे दिल में क्या अब भी जड़ी हूँ।

चलती रहती हूँ ऐसे अकेली,
जैसे दीवार की इक घड़ी हूँ।

इन बहारों के मौसम में तुम बिन,
सूखे पत्तों की तरहा झड़ी हूँ।

मैं धरा तू गगन जानती हूँ,
फिर भी मिलने की ज़िद पे अड़ी हूँ।

अपनी पलकें बिछाए मैं ‘ममता’
तेरी राहों में कब से ख़डी हूँ।

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