
संगीता हड़के, भोपाल
माँ,
तू ही चिंतन, तू ही सुकून है,
रेगिस्तान में जैसे
ठंडी पानी की बूँद का सुकून है।
मैं कली सी नन्ही,
तू मेरी प्यारी बगिया है,
मुझमें समाए हर संस्कार
तेरी ही दी हुई दुनिया है।
गाँव मुझे पहचानता
तेरे ही नाम से,
बीता बचपन मेरा
तेरे संस्कारों की छाँव में।
संघर्ष तेरा देखा है मैंने
अभावों के दौर में,
फिर भी मुस्कुराती रही तू
हर कठिन मोड़ में।
पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया,
मुझे बड़ा किया,
सुखी जीवन मिले मुझे
यह संकल्प भी लिया।
तेरे आशीर्वाद की छाया में
हरदम रहना चाहती हूँ,
तेरी परछाईं हूँ माँ,
तेरी परछाईं बनकर ही जीना चाहती हूँ।
मेरे ये शब्द नहीं केवल शब्द,
तेरे अंतरमन की धारा हैं,
तुझे समर्पित माँ
मेरा ये जीवन सारा है।
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