वह बहक गई थी…

वह बहक गई थी
उसे महान बनने की पहली शर्त
अच्छा इंसान हो जाना लगी
लेकिन, महानता इस युग में नहीं पाई जाती

शायद उसने पढ़ें होंगे
कई बहुत पुराने धार्मिक ग्रंथ
किंतु, इस युग में ग्रंथ नहीं
इंसान पढ़ने की आवश्यकता है

इस पढ़ाई के लिए
होता नहीं विद्यालय कोई
होती नहीं परीक्षा भी कोई
केवल परिणाम होता है
जो पहुँचा सकता है हानि या लाभ’

‘जिसकी रही भावना जैसी
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’
यह मूर्खतापूर्ण पद्धति है
जो आपको खड़ी कर सकती है
पागलखाने की लंबी पंक्तियों के बीच

वहाँ आपको पहचान नहीं पाएगा कोई
वहाँ नहीं होगें आप कोई
लेखक, शिक्षक, अधिकारी या छात्र
होंगे केवल एक मानसिक रोगी
अतिवादिता मुँह फाड़कर हँसेगी
उसका होना हो जाएगा सफल

तुम्हारी अति संवेदनशीलता ही
मार देगी तुम्हें, तुम्हारे मरने से पहले
उस क्षण केवल छटपटाहट होगी

तुम खड़े होंगे जीवन और मृत्यु के बीच
जीवन तुमसे मुँह मोड़ लेगा
मृत्यु तुम्हें चली जाएगी छोड़ कर
अपनी मर्जी से लौट आने के लिए
तुम्हें उसी समय समझ आएगा
महान और इंसान बनने की प्रक्रिया का संघर्ष।

प्रिया राणा, लेखिका एवं असिस्टेंट प्रोफेसर, मेंगलौर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *