…खटकने लगोगे

यह रचना उस क्षण की सच्चाई बयान करती है जब व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं से बाहर निकलकर अपनी राह चुनता है। जैसे ही कोई अपने सपनों, अपनी आवाज़ और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होता है, वही समाज उसे चुभने वाला मानने लगता है। लेख जीवन की कमान अपने हाथ में रखने और स्वार्थी दुनिया की पहचान करने की सशक्त सीख देता है।

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वह बहक गई थी…

“महान बनने की चाहत में वह बहक गई थी, लेकिन इस युग में महानता नहीं, इंसान को पढ़ने की आवश्यकता है। न कोई विद्यालय, न परीक्षा, केवल परिणाम — जो या तो हानि देगा या लाभ। संवेदनशीलता की अति पागलपन की ओर ले जाती है, जहाँ न कोई पहचान होती है, न कोई अस्तित्व, बस एक मानसिक रोगी का दर्जा। यही है महान बनने की प्रक्रिया का असली संघर्ष।”

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