संग-संग चलें
धूप हो या वर्षा, सुख हो या दुःख सच्चा प्रेम हर परिस्थिति में साथ निभाने का नाम है। यह कविता जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य के बीच अटूट विश्वास, समर्पण और साथ रहने के वचन को बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।

धूप हो या वर्षा, सुख हो या दुःख सच्चा प्रेम हर परिस्थिति में साथ निभाने का नाम है। यह कविता जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य के बीच अटूट विश्वास, समर्पण और साथ रहने के वचन को बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।
यह कविता जीवन के संघर्ष, थकान और मृत्यु के सुकून भरे आलिंगन को गहराई से प्रस्तुत करती है। इसमें दर्द, जिम्मेदारियां और अंततः मिलने वाली शांति का ऐसा चित्रण है, जो पाठक को सोचने और आत्ममंथन करने पर मजबूर कर देता है।
इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।
वह लड़की ज़िंदगी को प्रेम की तरह जीना चाहती थी .शहर की भागदौड़ से दूर, पहाड़ों और जंगलों के बीच, हवा में बाँसुरी की धुन सुनते हुए। उसके हाथ में हमेशा पेन रहता, और हर शब्द उसके दिल की गहरी भावना बन जाता। वह जानती थी कि मौत भी तभी खूबसूरत होगी, जब वह लिखते-लिखते उसे मिले. जैसे जीवन का हर पल उसके प्यार और उसकी स्याही में समा गया हो।