
सुरेश परिहार,संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
उसने सब बता तो दिया था…
पर लोग सुनना कहाँ चाहते थे।
कि उसे शादी से डर लगता है
क्योंकि उसे किसी का होना नहीं,
किसी के साथ होना चाहिए था।
वह फ़ूडी नहीं थी।
उसे किताबों का स्वाद आता था।
पन्नों से उठती स्याही की खुशबू
उसे किसी भी पकवान से ज़्यादा लुभाती थी।
उसका पसंदीदा रंग सफ़ेद था
क्योंकि सफ़ेद में उम्मीद भी होती है
और इंतज़ार भी।
क्योंकि सफ़ेद वह रंग है
जिसमें प्रेम चुपचाप ठहरता है।
उसे बाँसुरी की धुन से प्यार था।
ऐसी धुन, जो सीने में उतरकर
दिल से बातें करने लगे।
वह उसे सीखना चाहती थी
ताकि किसी शाम,
पहाड़ों के बीच खड़े होकर
वह हवा को अपना दर्द सुना सके।
उर्दू…
उसे उर्दू के लफ़्ज़ों से इश्क़ था।
उनकी नज़ाकत, उनका ठहराव
जैसे हर शब्द
किसी प्रेम-पत्र का पहला वाक्य हो।
उसे शहर नहीं चाहिए थे।
उसे जंगल चाहिए थे
जहाँ पेड़ किसी से कुछ नहीं माँगते,
बस साथ देते हैं।
उसे पहाड़ चाहिए थे
मजबूत, खामोश, भरोसेमंद।
वह चाहती थी कि
ज़िंदगी के आख़िरी पल में
वह किसी पहाड़ को खिड़की से देख रही हो।
हवा उसके बालों से खेल रही हो।
और वह प्रकृति के बारे में लिख रही हो
जैसे वह उसका पहला और आख़िरी प्रेम हो।
उसके हाथ में एक पेन हो।
पूरा, गाढ़ी स्याही से भरा हुआ।
वह नहीं चाहती थी
गंगाजल या तुलसी की छाँव।
वह चाहती थी
कि मौत भी उसे
लिखते हुए मिले।
अगर उसकी साँस
किसी अधूरी पंक्ति पर टूट जाए—
तो भी कोई बात नहीं।
क्योंकि वह लड़की
किसी की पत्नी नहीं,
किसी की याद बनना चाहती थी।
और प्रेम…
उसके लिए
किसी इंसान में नहीं,
ज़िंदगी की हर साँस में था।

बहुत खूब रचना…..
शब्द कितने खूबसूरत हो सकते है किसी इंसान के व्यक्तित्व से भी ज्यादा ,,, और लिखने वाला उससे ज्यादा सशक्त हैं।बहुत खूबसूरत लिखा है आपने, साधुवाद
Aapne sabdon ko khoobsurati se parosa hai
Beautiful ❤️
अति सुन्दर