
निरुपमासिंह, बिजनौर
छेनी- हथौड़ा चलाते चलाते
पत्थरों को तराशते-तराशते
स्वयं भी पाषाण शिला सा हो गया।
या यूँ कहूँ कि
बुत बन कर रह गया
उसके भीतर का प्रेम
जैसे तराशे बुतों में
समाहित हो गया
क्या था वो कल
आज़ क्या हो गया
प्रेम-भाव तो जैसे
उस फ़नकार का
छू-मंतर हो गया
जो था कभी
प्रेम से लबालब भरा
आज़ उसके अंतर्मन का
स्त्रोत भी सूख कर
दरकती पपड़ी भर
बन कर रह गया
वो जानता भी था
गया वक्त तो गया
फिर लौट कर कभी आता नहीं
इतनी छोटी सी बात
वो भला क्यों कर
भूल गया…
उसे तो मात्र अपने
औजारों से प्रेम था
क्योंकि …
उदर शांति का निमित्त यही था
यही छेनी- हथौड़ी का साथ था
उसकी आजीविका का
साधन मात्र भी यही था।
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आपकी उत्कृष्ट कविता के लिए आपको साधुवाद
सुंदर रचना ✨
सुंदर रचना ✨
नए तेवर की कविता मन को भाई। बधाई