
विनिता गोविंदन, नई दिल्ली
कुछ आड़ी, कुछ तिरछी रेखाएँ,
भले न हों सटीक,
पर लगती हैं जैसे —
माँ के दो हाथों की टोकरी।
जिसमें सम्भाल कर रखा है एक जीवन,
जिसे वह पालती-दुलारती है…
जैसे केवल माँ ही कर सकती है।
तू छल-कपट सीख न पाई,
साल बीते, मैं बहुत बदली,
पर तुझमें देखी वही छवि —
उस छोटे-से गलती दोहराते बच्चे की,
जिसे हथेली पर रखा है।
रखूँ कैसे तुझे इस दुनिया के जंगल में?
चल उठ!
आ जा फिर हथेली में,
छुप जा आंचल में,
सो जा…
भूल जा अपनी दौड़-भाग,
क्योंकि इस जीवन-जंगल का खेल नहीं,
अंत है केवल — जंगल-आग।
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Wow, beautiful. Salute to all mothers. “Maa” – truly holds a special place.
कहानीकार ” कर्म की सीख ” बहुत सच्चाई पर आधारित है । बहुत से पण्डित/ ज्योतिषी इस पीढ़ी को कमज़ोर कर देते हैं , अपनी भविष्य वाणियों से जिनका आधार कुछ नहीं होता । उनके पास अधिक श्रेष्ठ कर्म का कोई ” उपाय ” नहीं है , पर ग्रहों की चाल बदलकर सब सुलभ कर सकते हैं …..आम लोगों को उनका निहित स्वार्थ देखना चाहिए।
Mother’s love is selfless. No match for it. Very well expressed by Vineeta Govindan.