
विजया डालमिया, हैदराबाद
तुम्हारी जिंदगी में
मैं जानना चाहती हूँ तुम्हें,
आना चाहती हूँ ज़िंदगी में तुम्हारी,
जैसे पलाश के फूल
अचानक लहर उठे हैं दामन में मेरे,
वैसे ही झूमना चाहती हूँ
आँगन में तुम्हारे।
दिल का दरवाज़ा
जो बंद कर रखा है कसकर तुमने,
खटखटाना चाहती हूँ
मन के द्वार तुम्हारे।
झाँकना चाहती हूँ ज़िंदगी में तुम्हारी,
आना चाहती हूँ ख़्वाबों में तुम्हारे,
खोल दो पलकों के रोशनदान,
मत मूँदो नयन,
मैं सजाना चाहती हूँ
सपन तुम्हारे।
समझना चाहती हूँ
उनकी ख़ामोशी,
क्यों वो झरोखे
झरने न बने…
मैं बसना चाहती हूँ
नैनों में तुम्हारे।
तुम कहते नहीं कुछ,
मगर वीरानी बोलती है
बानी तुम्हारी।
ना मैं किस्सा,
ना मैं हिस्सा,
फिर भी लिखना चाहती हूँ
किताब तुम्हारी,
दोहराना चाहती हूँ
कहानी तुम्हारी…
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आभार
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