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मिस्टिक स्टे

जोधपुर की शाही हवेली में हया और समर्थ तथा पीछे दिखाई देता मेहरानगढ़ किला शाही हवेली की खूबसूरती के बीच समर्थ के मन में उठती अनजानी आशंका।

प्रसिद्ध लेखिका सुषमा गुप्ता की लंबी कहानी मिस्टिक स्टे का दूसरा भाग

sushma gupta

सुषमा गुप्ता

छत पर रंग-बिरंगे अनगिनत फानूस थे। दीवारों पर हैंडीक्राफ्ट की अलग-अलग चीज़ें सजी हुई थीं। रंग-बिरंगी बहुत-सी कठपुतलियाँ काले धागों से बाँधकर जगह-जगह टाँगी गई थीं।

उस लड़के ने संकरे-से दरवाज़े वाले एक कमरे की तरफ इशारा किया।

उस कमरे में से ऊपर की तरफ सीढ़ियाँ जा रही थीं। सीढ़ियों से रोशनी की बारीक लकीरें फर्श पर नाचती आकृतियों का आभास पैदा कर रही थीं। हया और समर्थ कुछ देर विस्मित होकर लकीरों से बनने वाले पैटर्न देखते रहे।

लड़के ने आगे बढ़ते हुए फिर पुकारा, “आइए ना, सर।”

वे दोनों उस लड़के के पीछे धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

आधी सीढ़ियों के बाद अजय देवगन की बड़ी-सी तस्वीर लगी थी। उसे देखकर हया ने कहा, “फिल्मों के शौकीन लगते हो!”

“अरे नहीं, मैडम जी! यह तो इनकी एक फिल्म की शूटिंग यहीं हुई है। आगे और भी तस्वीरें आपको मिलेंगी। बहुत सारी फिल्मों की शूटिंग इस हवेली में हुई है।”

उसने बहुत गर्व के साथ कहा।

“यह हवेली किसकी है?” समर्थ ने पूछा।

“हमारे मालिक अभय सिंह की। वह दिल्ली में रहते हैं। कुछ साल पहले उन्होंने इस हवेली को होटल में बदल दिया था।”

जैसे-जैसे वे ऊपर बढ़ते गए, सीढ़ियों में रोशनी भी बढ़ती चली गई। ऊपर आकर वह लड़का बाईं तरफ वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

“यहाँ से व्यू ज़्यादा अच्छा है, इसलिए आपको इधर वाला कमरा पहले दिखाता हूँ।”

उस कमरे का दरवाज़ा खोलते ही रोशनी का एक सागर उमड़ पड़ा। कुछ पल के लिए हया की आँखें चौंधिया गईं। जब आँखें खुलीं, तो देखा, उस कमरे की खिड़की से मेहरानगढ़ का पूरा किला नज़र आ रहा था। हया खुशी से उछल पड़ी।

“अरे! समर्थ, देखो तो, यहाँ से कितना सुंदर नज़ारा दिख रहा है! नीचे नीले-नीले घर, ऊपर नीला आसमान और बीच में मेहरानगढ़ का इतना खूबसूरत किला।”

“दूसरा कमरा भी सुंदर है। आप देख लीजिए, क्या पता आपको वह ज़्यादा पसंद आए।”

“हाँ-हाँ, दिखाओ ना, भैया!”

हया उसके पीछे-पीछे चल दी और समर्थ हया के पीछे।

जब उस लड़के ने दूसरे कमरे का दरवाज़ा खोला, तो हया को लगा कि वह किसी दूसरी ही दुनिया में आ गई है। वह कमरा एकदम राजसी ठाट-बाट से सजा था। उस कमरे के बीचोंबीच शाही पलंग था, जिसके ऊपर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई थी। कमरे की खिड़कियों के काँच भी रंग-बिरंगे थे, जिन पर कठपुतलियाँ टँगी थीं।

हया मुग्ध थी। उसने समर्थ से कहा, “यहीं रुक जाएँ क्या?”

समर्थ कुछ कहता, उससे पहले ही लड़के ने कहा,

“आइए, आपको ऊपर लेकर चलता हूँ। एक कमरा ऊपर भी है और उसके ऊपर हमारा रेस्टोरेंट है। आप एक बार सब कुछ देख लीजिए।”

अब तो हया इतनी उत्सुक थी, जैसे कोई गड़ा खज़ाना उसे मिल गया हो।

ऊपर कमरे के बाहर महाराजा स्टाइल का झूला लगा था। हया खुशी से लपककर उस पर बैठ गई।

समर्थ उसे खुश देखकर खुश था, लेकिन उसे लगातार कुछ खटक भी रहा था। पर वह ‘कुछ’ क्या है, यह उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था।

लड़के ने ऊपर बना कमरा खोला। वहाँ के शाही पलंग की प्लेसमेंट भी ऐसी थी कि लेटे-लेटे भी पूरा किला नज़र आ सकता था।

“यह कमरा तो बहुत सोचकर बनाया गया लगता है,” समर्थ ने उस लड़के से कहा।

उस लड़के ने एक अलग-सी कुटिल मुस्कान के साथ कहा,

“सर, यह स्पेशल कमरा है। इसलिए ही सबसे महँगा भी है। पुराने ज़माने में, जब यह होटल नहीं था, तब हवेली के सबसे लाडले को ही यह कमरा दिया जाता था। आइए, अब रेस्टोरेंट भी देख लीजिए। मुझे यकीन है, वह भी आपको बहुत पसंद आएगा।”

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