gulmohar

ख़्वाबों का घर

बादलों के पार एक शांत प्रेमिल दुनिया का सपना देखते प्रेमी युगल का यथार्थवादी दृश्य कुछ ख़्वाब अधूरे रहकर भी दिल को ज़िंदा रखते हैं और प्रेम की उम्मीद जगाए रखते हैं।
vijaya dalmiya

विजया डालमिया, हैदराबाद

हमने दुनिया से अलग
हमारा घर बना रखा है…
जहाँ हमारे सिवा
किसी को आने की इजाज़त नहीं।
क्योंकि यहाँ वही आ सकता है,
जो प्रेम को समझता है,
श्रद्धा और समर्पण करता है,
आँसू के दीप जलाकर
रोज़ इंतज़ार करता है—
एक-एक दिन…
एक-एक पल का,
कि यह तपस्या कब पूरी होगी।
मैं भी उड़ जाना चाहती हूँ,
बादलों के पार—
तुम्हारा हाथ थाम।
जहाँ न कोई फ़िक्र हो,
न और किसी का ज़िक्र।
न कोई मलाल हो,
सिर्फ़ प्यार भरी बातों का
बेशुमार गुलाल हो।
हमारे दरमियाँ न कोई और आए,
न ही कोई ख़याल
ख़ामोशी को खनकाए।
सिर्फ़ एक धुन बजती रहे,
साँसें साँसों में सजती रहें।
मगर यह महज़ एक ख़्वाब है,
ये दिल जानता है…
इसीलिए तो ऐसे ख़्वाब बुनता है…
क्योंकि उसे पता है,
ख़्वाब ही तो हैं
जो उसे ज़िंदा रखे हैं।

8 thoughts on “ख़्वाबों का घर”

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