
विजया डालमिया, हैदराबाद
हमने दुनिया से अलग
हमारा घर बना रखा है…
जहाँ हमारे सिवा
किसी को आने की इजाज़त नहीं।
क्योंकि यहाँ वही आ सकता है,
जो प्रेम को समझता है,
श्रद्धा और समर्पण करता है,
आँसू के दीप जलाकर
रोज़ इंतज़ार करता है—
एक-एक दिन…
एक-एक पल का,
कि यह तपस्या कब पूरी होगी।
मैं भी उड़ जाना चाहती हूँ,
बादलों के पार—
तुम्हारा हाथ थाम।
जहाँ न कोई फ़िक्र हो,
न और किसी का ज़िक्र।
न कोई मलाल हो,
सिर्फ़ प्यार भरी बातों का
बेशुमार गुलाल हो।
हमारे दरमियाँ न कोई और आए,
न ही कोई ख़याल
ख़ामोशी को खनकाए।
सिर्फ़ एक धुन बजती रहे,
साँसें साँसों में सजती रहें।
मगर यह महज़ एक ख़्वाब है,
ये दिल जानता है…
इसीलिए तो ऐसे ख़्वाब बुनता है…
क्योंकि उसे पता है,
ख़्वाब ही तो हैं
जो उसे ज़िंदा रखे हैं।

वाह बहुत बढ़िया 👌