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आधा चेहरा

अधूरी दुर्गा प्रतिमा के पास खड़े बुजुर्ग मूर्तिकार अधूरी दुर्गा प्रतिमा में छिपा एक पिता का दर्द और अटूट भक्ति

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर

शरीर से दुबले-पतले बहत्तर वर्षीय मूर्तिकार रविशंकर जी को आँखों से कम दिखाई देता था और हाथ काँपते थे।

हर साल की तरह इस बार भी पंडाल वालों ने उन्हें पचास हजार रुपये में दुर्गा माँ की मूर्ति बनाने का ऑर्डर दिया। लेकिन इस बार शहर से दस हजार रुपये में फाइबर की एक बड़ी मूर्ति आ गई। पंडाल वालों ने ऑर्डर रद्द कर दिया।

मूर्तिकार रविशंकर जी मौन रहे। कुछ नहीं कहा। बस अपनी आधी बनी मूर्ति को निहारते रहे।

उनकी पत्नी ने कहा, “ऑर्डर रद्द हो गया तो छोड़ दो। अब यह मिट्टी चूल्हा लीपने के काम आएगी।”

रविशंकर जी मुस्कुराए। सात दिन तक मौन रहकर अकेले ही काम में लगे रहे। न किसी से एक पैसा लिया, न ही मूर्ति दिखाई।

अष्टमी के दिन से ही पूरे गाँव में मेले की रौनक लगी थी। नवमी के दिन पूरा गाँव शहर से लाई गई चमचमाती मूर्ति की आरती कर रहा था।

तभी एक बच्चा जोर से चिल्लाया, “वो देखो!”

बच्चे की चीख सुनकर सभी उस तरफ देखने लगे, जिधर उसने उँगली उठाई थी। देखकर गाँववाले हतप्रभ रह गए।

रविशंकर जी अपनी आधी-अधूरी बनी मूर्ति को ठेले पर रखकर पोखर की तरफ ले जा रहे थे। मूर्ति का सिर्फ एक तरफ का चेहरा बना था। दूसरी तरफ कच्ची मिट्टी ही थी।

सारे लोग ठठाकर हँस पड़े और ताना मारने लगे।

“पगला गया है बुड्ढा!”

“अरे भाई, बुढ़ापे में दिमाग सठिया गया है!”

“बेचारा, ऑर्डर जो कैंसिल हो गया!”

मूर्तिकार रविशंकर जी ने न तो उन लोगों की ओर ध्यान दिया और न ही उनकी बातों पर कोई प्रतिक्रिया दी। पोखर के किनारे मूर्ति रखी और खुद पानी में उतरकर धीरे-धीरे मूर्ति का विसर्जन करने लगे।

उन्हें ऐसा करते देख किसी ने पूछा, “मूर्ति पूरी भी नहीं बनाई, फिर विसर्जन क्यों?”

रविशंकर जी ने कहा, “मेरी माँ पूरी कभी थी ही नहीं। मेरा एक हाथ मेरी बेटी ने पकड़ रखा था, जो इस बार दुर्गा पूजा में घर नहीं आई। आधा मन वहीं रह गया, तो माँ का चेहरा भी आधा ही बना! भक्ति तो पूरी है न? माँ आधे चेहरे से भी सब सुन लेगी।”

पानी में मूर्ति घुल रही थी और आधा बना चेहरा मुस्कुरा रहा था।

उस दिन लोगों को समझ में आ गया कि भक्ति मूर्ति के पूरे होने में नहीं, बल्कि मूर्तिकार के टूटे हुए मन के जुड़े होने में है।

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