
अनुपमा भार्गव
आभार एक सकारात्मक शब्द है,
जो इंसानी रिश्तों को
मजबूत बनाता है।
आभार व्यक्त करने से
बोलने और सुनने वाले, दोनों के
चेहरों पर अनायास ही
मुस्कान आ जाती है।
मन का अहम और बैर-भाव
जाने कहाँ लुप्त हो जाता है,
आत्मा शुद्धता और निर्मलता पाती है।
पहला आभार उस ईश्वर का,
जिसने यह संसार रचा।
हर खुशनुमा दिन की शुरुआत
हम ईश्वर को धन्यवाद देकर करें,
तो पूरा दिन सकारात्मक गुजरेगा।
कृतज्ञ भाव से काम करने पर
हर कार्य भी सफल होगा।
माता-पिता का आभार करना
कभी नहीं भूलें,
उन्होंने हमें जन्म दिया,
पाल-पोसकर बड़ा किया
और हमारे लिए
हर कष्ट सहा।
जो माता-पिता का आभारी नहीं,
वह कभी सुख-शांति नहीं पाएगा।
वक्त हाथ से निकल जाने के बाद
बहुत पछताएगा।
आभार उन सभी शिक्षकों का,
जिन्होंने हमें ज्ञान दिया,
समाज में सिर उठाकर
जीने योग्य बनाया।
जो शिष्य आभारी होना
नहीं सीखेगा अपने ज्ञान का,
कभी समुचित उपयोग
नहीं कर पाएगा।
अपने मित्रों, सहयोगियों का भी
व्यक्त करें सदा आभार।
आपसी प्रेम और सद्भाव से ही
चल रहा यह संसार।
जो अपने मित्रों के प्रति
आभारी नहीं रहेगा,
वह स्नेह, प्रेम और मदद से
हमेशा वंचित रहेगा।
इसीलिए अपने दैनिक जीवन की
आदतों में आभार व्यक्त करने की
आदत को हमेशा शामिल करें।
जब कोई भी किसी काम में
आपकी मदद करे,
प्रतिक्रिया में आप
उन सभी बातों के लिए
धन्यवाद दें।
आपकी यह आदत
सभी को खुशी और सुकून देगी,
सबके साथ सुंदर रिश्ता बनेगा,
जिंदगी खुशनुमा रहेगी।
आपके पास जो कुछ भी है,
उसके लिए आभारी रहें।
हम शिकायत तो बात-बात में करते हैं,
आभारी कभी नहीं होते।
आभारी होने से आत्मा की शक्ति
बढ़ती है,
मन भी निर्मल हो जाता है,
आपस में मैत्री बढ़ती है।
आभारी रहो कि इस दुनिया में
बहुत से लोगों ने हमें
बहुत कुछ दिया है।
हम उनसे लेते ही न रहें,
कुछ दें भी।
इसीलिए प्रतिक्रियास्वरूप
आभार शब्द बना है।
आभारी हूँ मैं उन सबकी,
जिन्होंने आभारी होना सिखाया,
इंसान को इंसान के
काम आना सिखाया।

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