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अनुबंध

मौन प्रेम और अनकहे संबंधों को दर्शाता भावपूर्ण दृश्य कुछ संबंध शब्दों से नहीं, धड़कनों और मौन से लिखे जाते हैं।

-सीमा त्रिवेदी साज़, नवी मुंबई

मौन अधरों की सुनो तुम, गीत में संबंध लिखना।
एक दूजे के अधूरे, पूर्ण हो अनुबंध लिखना॥
वह प्रथम मिलना हमारा, दृष्टि विचलित जब हुई थी।
चेतना के उपवनों में, प्रीति-कलियाँ भी खिली थीं॥
पसोपेशी द्वंद्व में तब, था खिसकता वक़्त सारा।
रेशमी कोमल क्षणों का, अब बना लो गीत प्यारा॥
धड़कनों की वर्णमाला, प्रीत का ही छंद लिखना।
एक दूजे के अधूरे, पूर्ण हो अनुबंध लिखना॥
चाहतों के सिंधु में जब, तप्त लहरें-सी उठी थीं।
संयमों की वर्जनाएँ, तट सरीखी तब डटी थीं॥
तन छुए बिन रूह छुई जब, था अलौकिक वह सवेरा।
धड़कनों की गीतिका पर, नाम तेरा था उकेरा॥
अनछुई उन सिहरनों में, नेह का मकरंद लिखना।
एक दूजे के अधूरे, पूर्ण हो अनुबंध लिखना॥
आज सम्मुख बैठ मेरे, क्यों नयन ये मौन से हैं?
प्यास मन में जो जगी है, क्या उसे हम पढ़ सके हैं?
आस भरी कितनी उमंगें, बात जो तुमको सुनानी।
मौन अधरों पर रुकी है, एक व्याकुल-सी कहानी॥
साँस की कोरी चुनर पर, नाम हम संग लिखना।
एक दूजे के अधूरे, पूर्ण हो अनुबंध लिखना॥
उस दुपट्टे के किनारे, धूप की कतरन छिपी है।
साँझ की वीरानियों में, एक हलचल-सी जगी है॥
नम हवाओं के लिफ़ाफ़े, खोलकर तुम अब पढ़ो ना।
अश्रु वाली बारिशों के, गीत में भी तुम बसो ना॥
वृक्ष की छालों पे अंकित, प्रेम का प्रतिबंध लिखना।
एक दूजे बिन अधूरे, पूर्ण हो अनुबंध लिखना॥
छोड़ आई पास तेरे, एक रेशम-सी हँसी मैं।
आज भी हूँ मौन ठहरी, रूह की उस अनकही में॥
एक सूनी साँझ का वो, भीगता-सा स्वप्न उतरे।
दृग के झरनों से बहकर, वेदना का मर्म बिखरे॥
राख में लिपटी हुई उस रूह से संबंध लिखना।
एक दूजे बिन अधूरे, पूर्ण वह अनुबंध लिखना॥
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