
सुरेश परिहार
उम्र के उस पड़ाव पर, जहाँ लोग अक्सर अपने बच्चों के भविष्य, घर की जिम्मेदारियों और बीते हुए समय का हिसाब रखने लगते हैं, रिद्धिमा अपने दिल को समझाने में लगी थी कि अब उसे किसी से जुड़ने की जरूरत नहीं है.
पचास के आसपास की उम्र में उसने जिंदगी से बहुत कुछ सीखा था. कुछ रिश्ते समय के साथ छूट गए थे, कुछ ने भीतर ऐसी जगह चोट पहुँचाई थी, जहाँ तक किसी की पहुँच नहीं होनी चाहिए थी. उसने धीरे-धीरे खुद को समेटना सीख लिया था. अब वह किसी से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करती थी, किसी के आने की राह नहीं देखती थी और किसी के चले जाने की कल्पना से भी बचती थी.
उसे लगता था कि इस उम्र में मन को शांत रखना ही सबसे बड़ी समझदारी है. प्रेम, आकर्षण और रिश्तों की उलझनों से दूर रहना ही बेहतर है. आखिर अब उसे किसी के सहारे की जरूरत ही क्या थी?
लेकिन मन हमेशा वही नहीं मानता, जो हम उसे समझाते हैं.
सोशल मीडिया पर साहित्य से जुड़ी एक चर्चा के दौरान उसकी मुलाकात राघव से हुई. बातचीत किसी कविता से शुरू हुई, फिर किसी कहानी तक पहुँची और धीरे-धीरे जिंदगी के उन हिस्सों तक जा पहुँची, जिनके बारे में रिद्धिमा हर किसी से बात नहीं करती थी.
राघव उसे अच्छा लगता था. उसकी बातों में एक सहजता थी. उससे बात करते हुए रिद्धिमा को अपने शब्दों को बार-बार तौलना नहीं पड़ता था. वह उसकी बात सुनता था, असहमति होने पर भी उसकी भावनाओं का सम्मान करता था और कभी अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं करता था.
धीरे-धीरे उनकी बातचीत रोजमर्रा का हिस्सा बन गई.
कभी किसी किताब पर चर्चा होती, कभी किसी कविता की पंक्ति पर. कभी रिद्धिमा अपने दिन की कोई छोटी-सी बात बता देती, तो कभी राघव अपने अनुभव साझा करता. इन बातचीतों के बीच उसे एहसास ही नहीं हुआ कि वह लंबे समय बाद किसी से बात करते हुए सहज महसूस करने लगी है. लेकिन जैसे-जैसे यह सहजता बढ़ती, उसके भीतर एक पुराना डर भी सिर उठाने लगता.
कहीं वह फिर से किसी से जुड़ने तो नहीं लगी?
वह खुद को टोकती. उसे याद दिलाती कि हर रिश्ता तकलीफ भी दे सकता है. किसी पर भरोसा करना अपने मन की शांति किसी दूसरे के हाथों में सौंपने जैसा है. और अगर फिर वही हुआ तो? अगर उसने किसी को अपने भीतर जगह दे दी और अंत में फिर अकेली रह गई तो? इसलिए कभी-कभी वह बिना किसी कारण बातचीत कम कर देती. संदेश पढ़कर भी जवाब देने में देर करती. अपने मन में उठते स्नेह को व्यस्तताओं के पीछे छिपा देती.
राघव उसकी दूरी महसूस करता था, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की. न कोई सवाल, न कोई उलाहना. वह रिद्धिमा से उतनी ही सहजता से बात करता, जितनी सहजता से वह बात करना चाहती थी.
एक दिन राघव ने मिलने की बात कही.
रिद्धिमा ने संदेश पढ़ा और कुछ देर तक सोचती रही. मन तो था कि उससे मिले, लेकिन मिलने के बाद क्या होगा, यही सोचकर घबरा रही थी.
आखिर उसने जवाब दिया- ठीक है, मिलते हैं.
मुलाकात के दिन वह तय समय से कुछ पहले ही पहुँच गई. मन में कई बातें चल रही थीं. क्या कहेगी, कैसे बात करेगी, कहीं वह उसके बारे में कुछ और तो नहीं सोच रहा होगा?
जब राघव आया, तो सब कुछ सामान्य था. वही परिचित मुस्कान, वही सहज बातचीत. कुछ देर साहित्य की बातें हुईं, फिर जिंदगी की. रिद्धिमा को अच्छा लगा कि राघव उसे प्रभावित करने की कोई कोशिश नहीं कर रहा था. वह बस उसके साथ बैठा था, उसकी बातें सुन रहा था.
कुछ देर बाद रिद्धिमा ने कहा- एक बात कहूँ?
हाँ, कहो.
मुझे रिश्तों से डर लगता है.
राघव ने उसकी ओर देखा. किस बात का डर?
यही कि कहीं फिर से वही सब न हो. किसी के करीब आना, उससे उम्मीदें लगाना और फिर एक दिन सब कुछ खत्म हो जाना. बहुत मुश्किल से खुद को संभाला है मैंने. अब दोबारा उस सब से गुजरने की हिम्मत नहीं है.
राघव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला-समझ सकता हूँ. लेकिन तुम मुझसे क्या चाहती हो?
रिद्धिमा इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी.
पता नहीं, उसने धीरे से कहा-तुमसे बात करना अच्छा लगता है. तुम्हारा इंतजार भी रहने लगा है. लेकिन जैसे ही लगता है कि मैं तुम्हारे करीब आ रही हूँ, डर लगने लगता है.
तो इसमें गलत क्या है? किसी से बात करना अच्छा लगने लगा है, तो लगने दो. हर बात का फैसला अभी करना जरूरी है क्या?फफ
रिद्धिमा ने उसकी ओर देखा. ङ्गङ्घतुम्हें बुरा नहीं लगता? कभी मैं बहुत बात करती हूँ, कभी अचानक चुप हो जाती हूँ.फफ
बुरा तो तब लगेगा, जब तुम मन मारकर मुझसे बात करोगी. जब मन हो, बात करना. जब मन न हो, तो मत करना. बस इतना चाहूँगा कि जो भी हो, तुम अपने मन से करो.
रिद्धिमा कुछ नहीं बोली. उसे पहली बार लगा कि कोई उसके डर को दूर करने के लिए उस पर दबाव नहीं डाल रहा था.
उस दिन लौटते समय उसके भीतर कोई बड़ा फैसला नहीं था, लेकिन एक छोटी-सी राहत जरूर थी.
इसके बाद भी उसके डर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए. कभी वह फिर पीछे हट जाती, कभी राघव के शब्दों का अर्थ तलाशने लगती. उसे डर था कि कहीं यह अपनापन कुछ समय का तो नहीं. कहीं राघव भी दूसरे लोगों की तरह एक दिन बदल तो नहीं जाएगा?
लेकिन राघव ने कभी उससे कोई हिसाब नहीं माँगा. वह बात करता, उसकी सुनता और उसे अपनी गति से आगे बढ़ने देता.
एक शाम फोन पर बात करते हुए रिद्धिमा ने पूछा-राघव, एक बात पूछूँ?
पूछो.
तुम्हें कभी नहीं लगता कि मैं तुम्हें अपने जीवन में पूरी जगह नहीं दे पा रही हूँ?
लगता है,राघव ने बिना झिझक कहा.
रिद्धिमा चुप हो गई.
राघव ने बात आगे बढ़ाई, तुम्हारी जिंदगी में मेरी भी कुछ जगह हो, ऐसा मैं चाहता हूँ. लेकिन यह जगह तुम अपनी मर्जी से दो, किसी दबाव में नहीं. मैं यह नहीं चाहता कि मेरे साथ रहने के लिए तुम्हें अपने डर को झुठलाना पड़े.रिद्धिमा की आँखें भर आईं.उसे समझ आने लगा था कि किसी का करीब होना और किसी का अधिकार जताना दो अलग बातें हैं. किसी का साथ चाहना गलत नहीं, लेकिन उस चाहत के लिए दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन लेना प्रेम नहीं हो सकता. कुछ दिनों बाद उसने राघव से पूछा-अगर मैं कभी तुम्हारे जीवन में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाई, तो?
राघव ने कहा-तो हम जितना साथ चल पाएँगे, उतना चलेंगे. मैं तुम्हें किसी ऐसी जगह खड़ा नहीं करना चाहता, जहाँ तुम्हें हर वक्त लगे कि तुम मुझे कुछ दे नहीं पा रही हो.
…और अगर मैं कभी तुम्हारी जिंदगी से चली गई?
इस बार राघव कुछ देर चुप रहा.
दुख तो होगा, रिद्धिमा. तुम्हारी आदत हो गई है मुझे. लेकिन इस डर से कि तुम चली जाओगी, मैं तुम्हें रोकने लगूँ, यह ठीक नहीं होगा.
तुम्हें सच में इतना आसान लगता है?
आसान नहीं है. शायद बहुत मुश्किल होगा. लेकिन किसी को खोने के डर से उसे बाँधकर रखना भी तो कोई रिश्ता नहीं हुआ.फफ
रिद्धिमा देर तक कुछ नहीं बोली.
उसे पहली बार किसी ने यह नहीं समझाया था कि प्रेम करने के लिए उसे अपने डर पर विजय पाना ही होगा. राघव ने बस इतना किया था कि उसे अपने डर के साथ भी सहज रहने की जगह दी थी.
उस रात रिद्धिमा देर तक जागती रही. उसे अपने पुराने अनुभव याद आए. उसने महसूस किया कि उन अनुभवों ने उसे सावधान तो बनाया था, लेकिन उनसे बचते-बचते उसने अपने मन की संभावनाओं को भी सीमित कर लिया था. वह दोबारा टूटना नहीं चाहती थी. मगर क्या टूटने के डर से किसी के करीब आने की संभावना को हमेशा के लिए नकार देना भी ठीक था?
उसने फोन उठाया. राघव का आखिरी संदेश अब भी स्क्रीन पर था.
तुम्हें कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं है.
रिद्धिमा ने संदेश पढ़ा और फोन रख दिया. फिर कुछ सोचकर उसे दोबारा उठाया और लिखने लगी.राघव, मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा. मैं यह भी नहीं कह सकती कि मेरा डर पूरी तरह खत्म हो जाएगा. लेकिन अब मैं सिर्फ डर की वजह से तुमसे दूर नहीं भागना चाहती. मुझे थोड़ा वक्त लगेगा. खुद पर और तुम पर भरोसा करना सीखने में.
जवाब आने में कुछ ही पल लगे.
जितना वक्त चाहिए, लो. मुझे कोई जल्दी नहीं है.फफ
रिद्धिमा की आँखों से आँसू बह निकले. यह दुख के आँसू नहीं थे. शायद इसलिए कि बहुत दिनों बाद उसे अपने मन की बात कहने के लिए माफी नहीं माँगनी पड़ी थी.उसने खिड़की खोल दी. बाहर रात वैसी ही थी, जैसी हर रात होती थी. शहर, कमरा और जिंदगी की जिम्मेदारियाँ भी वही थीं. बस, उसके भीतर कुछ बदल गया था.
उस रात उसने राघव से कोई वादा नहीं किया. अपने लिए भी कोई फैसला नहीं लिया. बस, खिड़की खुली रहने दी.
और शायद फिलहाल इतना ही काफी था.
क्योंकि कुछ दरवाजे प्रेम के आने से नहीं, भरोसा लौटने से खुलते हैं. और कभी-कभी, किसी का ठहर जाना ही हमें अपने भीतर लौटने का रास्ता दिखा देता है.
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