
सीमा मधुरिमा
बड़ा बेटा सिगरेट फूँकते पकड़ा गया,
पिता ने गुस्से में पूछा…
“आखिर क्यों पीते हो सिगरेट?”
बेटे ने बेझिझक जवाब दिया…
“माँ के कारण!”
“क्या मतलब? माँ के कारण?”
“हाँ पापा, माँ के कारण!
वह एक पल को चुप नहीं रहती,
दिन भर मेरे आगे-पीछे मंडराती रहती है।
कभी चिल्लाती है…
‘खाना खा लो!’
कभी सिर पर सवार होती है…
‘पढ़ाई कर लो!’
कभी कमरे में झाँकती है,
कभी फोन खँगालती है,
कभी दोस्तों का हिसाब माँगती है,
कभी भविष्य का भय दिखाती है।
न खुद चैन से बैठती है,
न मुझे बैठने देती है।
अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाती है,
और मेरा दिमाग खाती है!
पापा, मुझे स्पेस चाहिए… स्पेस!
और आप कौन-से दूध के धुले हैं?
आप भी तो माँ के कारण ही
शराब पीने लगे हैं!
घर में कम, बाहर ज़्यादा रहते हैं,
माँ से बचने के बहाने
न जाने कहाँ-कहाँ बैठते हैं।
और सुनिए पापा,
वो बाहर वाली आंटी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।
कितनी स्मार्ट हैं, कितनी समझदार!
न खाने पर टोकती हैं,
न पढ़ाई का राग अलापती हैं,
न हर पल मेरे पीछे पड़ी रहती हैं।
आपको भी समझती हैं,
मुझे भी समझती हैं।
और तो और,
मेरे साथ सिगरेट भी फूँक लेती हैं!
काश, मेरी माँ भी
उनकी जैसी होती!
पिता अवाक् थे…
लेकिन बेटे के सवाल अभी बाकी थे।
“पापा, ये माँ लोग सदियों से ऐसी ही क्यों हैं?
न अपने लिए जीती हैं,
न अपने लिए कुछ सोचती हैं।
न अपने ख्वाब सँजोती हैं,
न अपने मन का कुछ करती हैं।
बस पति की चिंता,
बच्चों की चिंता,
घर की चिंता,
हमारे भविष्य की चिंता!
हमने खाना खाया या नहीं,
हम पढ़ रहे हैं या नहीं,
हम कहाँ जा रहे हैं,
किससे मिल रहे हैं,
कब लौटेंगे,
कब सोएँगे, कब जागेंगे…
आखिर हमारी जिंदगी है या
माँ की चौबीस घंटे चलने वाली ड्यूटी?
माँ को समझना होगा,
अब हम पुराने ज़माने के बच्चे नहीं रहे।
हमें अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीनी है,
हमें अपनी गलतियाँ खुद करनी हैं,
हमें गिरकर खुद सँभलना है।
हमें स्पेस चाहिए…
बहुत सारा स्पेस!
और पापा को भी स्पेस चाहिए।
उन्हें भी अपनी मर्जी से जीना है,
दोस्तों के साथ बैठना है,
अपनी पसंद का जीवन जीना है।
माँ, तुम सबको बाँधकर क्यों रखना चाहती हो?
कभी खुद को भी तो आज़ाद करके देखो!
तुम्हारे भी कुछ सपने होंगे,
कुछ इच्छाएँ, कुछ अरमान होंगे।
कभी अपनी पसंद का खाना खाओ,
कभी सजो-सँवरो, कहीं घूम आओ।
हर वक्त हमारी थाली में रोटी परोसने के बजाय
कभी अपने लिए भी जिंदगी परोसो!
लेकिन सुनो, दुनिया की तमाम माँओं!
तुम्हारी चिंता अगर प्रेम है,
तो हमारी साँसों पर पहरा क्यों है?
तुम्हारा अनुभव अगर अनमोल है,
तो हमारी गलतियों की गुंजाइश क्यों नहीं?
तुम्हारा त्याग अगर इतना महान है,
तो तुम्हारे अपने सपनों का गला
हर बार क्यों घोंट दिया जाता है?
और सुनो, दुनिया के तमाम पिताओं!
बच्चों को स्पेस चाहिए,
पत्नी को भी स्पेस चाहिए।
पर स्पेस का अर्थ यह तो नहीं
कि जिम्मेदारियों से ही मुँह मोड़ लिया जाए!
नशे के लिए माँ को दोष देना आसान है,
शराब के लिए पत्नी को जिम्मेदार ठहराना आसान है,
अपनी हर गलती का ठीकरा
किसी और के सिर फोड़ देना आसान है।
मगर अपने भीतर झाँकना कठिन है,
अपनी आदतों की जिम्मेदारी लेना कठिन है।
सिगरेट का कश हो या शराब का प्याला,
उसका फैसला अपना है…
दोष किसी और का बताना
सिर्फ एक बहाना है।
तो माँ, तुम्हें भी स्पेस चाहिए,
पिता को भी स्पेस चाहिए,
बच्चों को भी स्पेस चाहिए।
रिश्तों को साँस लेने दो,
प्रेम को पहरा मत बनाओ।
अपनों को इतना मत बाँधो
कि वे आज़ादी के नाम पर
अपनों से ही दूर भागने लगें।
और हाँ, माँ!
बच्चों को स्पेस देते-देते
अपनी जिंदगी को मत भूल जाना।
क्योंकि तुम केवल माँ नहीं हो,
एक स्वतंत्र मनुष्य भी हो।
प्रेम करो, मगर कब्ज़ा मत करो।
परवाह करो, मगर पहरा मत दो।
रिश्ते निभाओ, मगर खुद को मिटाकर नहीं।
क्योंकि जिस घर में
हर किसी को अपनी जगह मिलती है,
उसी घर में रिश्तों को
सचमुच जीने की जगह मिलती है।
और जिस दिन यह बात समझ आ गई,
शायद किसी बेटे को
अपनी घुटन मिटाने के लिए सिगरेट का सहारा न लेना पड़े,
किसी पिता को
घर से भागने के लिए शराब का बहाना न बनाना पड़े,
और किसी माँ को
अपने ही परिवार के बीच
अपने अस्तित्व के लिए न तरसना पड़े।
स्पेस चाहिए… स्पेस!
हाँ, सबको चाहिए।
लेकिन स्पेस के नाम पर
अपनों से भागना नहीं,
अपनों को समझना भी सीखिए!
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