सांझ के समय चौराहे पर खड़ा एक व्यक्ति, जीवन के फैसलों और अस्तित्व पर विचार करता हुआ, भावनात्मक और यथार्थवादी दृश्य

एक जिंदगी, हजार सवाल

जिंदगी एक ऐसा अनुभव है जो कभी भ्रम बनकर सामने आती है, तो कभी ख्वाब की तरह आंखों में उतर जाती है. यह हँसी और आँसू के बीच झूलती हुई एक अनकही बेचैनी है, जिसे इंसान जीवन भर सुलझाने की कोशिश करता रहता है. कभी अधूरी रह जाती है, तो कभी मुकम्मल होकर भी सवाल छोड़ जाती है.

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ऊँचाई से बादलों, पहाड़ों और समुद्र को देखते हुए शांत मन का प्रतीक दृश्य, ध्यान और मानसिक शांति को दर्शाता हुआ।

ध्यान : जीवन को ऊँचाई से देखने की कला

ध्यान जीवन को ऊँचाई से देखने की कला है। यह लेख बताता है कि कैसे मन को शांत कर, विचारों से ऊपर उठकर जीवन को सरल और सहज बनाया जा सकता है।

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भागती जिंदगी और खालीपन को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें समय की कमी, धन की दौड़ और सुकून से दूर होता आधुनिक मनुष्य दिखाई देता है

खाली हाथ जाना है…

यह कविता आधुनिक जीवन की भागदौड़, दौलत की अंधी दौड़ और सुकून से दूर होते इंसान की विडंबना को उजागर करती है। “मेरी-मेरी” में उलझे मनुष्य की मानसिकता और खोते मानवीय संबंधों पर यह एक गहरी, आत्ममंथन कराती हुई टिप्पणी है।

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संवाद और ख़्याल

आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।

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क्रान्ति

ह कविता तात्कालिक सुख और अधैर्य से भरी दुनिया के बीच धैर्य, साधना और विचार की क्रान्ति का घोष है। रिश्तों को मौसमी फल-फूल नहीं, बल्कि चिनार और आम जैसे दीर्घजीवी वृक्ष मानते हुए यह रचना बताती है कि सच्चा परिवर्तन समय, सतत प्रयास और विश्वास से जन्म लेता है और वही विचारों की वास्तविक क्रान्ति है।

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हिंसा और अहिंसा

हिंसा और अहिंसा केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच और कर्म की दिशा हैं। कोई शरीर को मारता है, कोई मन को—और दोनों ही पीड़ा छोड़ जाते हैं। जो तड़पते को देखकर भी अकड़ जाए, वही सच्ची हिंसा है; और जो बिना कहे दुख हर ले, वही अहिंसा। जीवन की असली परीक्षा वहीं है, जहाँ करुणा सवाल बनकर खड़ी हो जाती है।

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जीवन एक संगीत

जीवन एक मधुर संगीत की तरह है, जिसमें सुख और दुःख उसके स्वरों की भाँति आते-जाते रहते हैं। संयम, विश्वास और परहित की भावना से भरा यह जीवन, गीता के ज्ञान को आत्मसात कर हर भव से पार हो सकता है। जब मन ईर्ष्या और लोभ से मुक्त होकर आशा, ममता और सत्य को अपनाता है, तब जीवन स्वयं एक संगीतमय चमन बन जाता है।

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गुड़ वाली चाय और मैं

गुड़ वाली चाय और मैं दोनों थोड़े देसी, थोड़े अनगढ़, पर पूरी तरह ईमानदार। जैसे गुड़ अपने रंग को धीरे-धीरे पानी में खोलता है, वैसे ही मेरी मिठास भी समय लेकर सामने आती है। सादगी में भी स्वाद छिपा होता है, यही हमें एक-दूसरे से जोड़ता है।

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रिश्तों की अहमियत समझो, डस्टबिन में मत डालो

सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।

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नियति से बहस नहीं

शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र) बचपन से ही मैंनेख़ुद को पीछे रखकरसबकी सेवा की।लोग आश्वासन देते रहेइसका फल ज़रूर मिलेगा। फल की कभी चाह नहीं रही,बस कोई स्नेह सेदो मीठे बोल कह देतो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते। शायद यही मेरी नियति थी,या शायद मेरा होना हीकिसी और का सहारा बनने के लिए…

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