हिंदी कविता
वर्तमान की गुफ्तगू
जब हालात असहनीय होने लगते हैं, तब बोलना और सवाल करना जरूरी हो जाता है। ‘वर्तमान की गुफ्तगू’ चुप्पी, विरोध और संवाद के बीच बेहतर भविष्य की तलाश करती एक संवेदनशील हिंदी कविता है।
बोलो कुछ तो बोलो
अनुपमा भार्गव बोलो बोलो, कुछ तो बोलो,अंतर्मन की आँखें खोलो।छाया है चहुँ ओर अँधेरा,चुप रहने से वो और गहरा हो जाएगा।सुख का सूरज न निकलेगा,दुःख गहरा होकर बढ़ जाएगा। इस धरती माँ पर सबका हक है,पशु-पक्षी और अमीर-गरीब।कुछ ने सब कुछ दबा लिया हैऔर कुछ हैं शोषित, पीड़ित।साथ सदा दो निर्बल का,खुद को सत्कर्मों से…
चलो छोड़ो भी…
हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता और हर सफर मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ‘चलो छोड़ो भी…’ कविता टूटते भरोसे, बदलते रिश्तों और जीवन में समय के साथ आगे बढ़ने की बात कहती है।
अगर मुड़ के देखे, जो तू मुझको एक बार…
कभी कोई लौटकर सिर्फ एक बार मुड़कर देख ले, तो बरसों की रंजिशें मिट सकती हैं। यह कविता प्रेम, इंतज़ार, विरह और बीते पलों की उन यादों को स्वर देती है, जो आज भी दिल में जीवित हैं।
बापू तेरे देश में…
‘बापू तेरे देश में’ कविता बदलते सामाजिक परिवेश की तस्वीर सामने रखते हुए सत्य, मानवीयता, पर्यावरण और सामाजिक व्यवहार जैसे विषयों पर गंभीर सवाल उठाती है।
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ मुझे स्वीकार हैं, क्योंकि संघर्ष से घबराना मेरी प्रकृति नहीं। प्रेम, त्याग और आत्मबल से भरी यह कविता जीवन के हर रण में स्वयं पर विश्वास रखने की बात करती है।
विपरीत हवाओं में उड़ना
विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ना आसान नहीं होता। यह कविता संघर्ष, परिवर्तन, प्रेम और असंभव लगने वाली परिस्थितियों के बीच उम्मीद की तलाश को अभिव्यक्त करती है।
अन्याय का समर
अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय जागने और अपने कर्तव्यों को पहचानने का आह्वान करती यह कविता मानवता, न्याय और सामाजिक चेतना की आवाज़ बनकर सामने आती है।
