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सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति और पहचान बनाती भारतीय महिला।

सोशल मीडिया पर वह

चारदीवारी में गुमसुम रहने वाली स्त्री जब सोशल मीडिया पर अपने शब्दों के सहारे बोलने लगती है, तो उसकी भावनाओं, प्रतिभा और अस्तित्व को नई पहचान मिलती है। छाया सीमा खंडागळे की यह कविता डिजिटल दुनिया में नारी की अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास को रेखांकित करती है।

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विजयादशमी पर जलते रावण के पुतले के सामने आत्ममंथन करता व्यक्ति

जलते पुतले, बढ़ते रावण

विजयादशमी केवल रावण का पुतला जलाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर भी है। यह कविता लोभ, अहंकार, छल, अन्याय और टूटते विश्वास पर सवाल उठाते हुए सच्चे विजयादशमी पर्व का अर्थ समझाती है। संदेश स्पष्ट है जब तक मन का रावण जीवित है, तब तक वास्तविक विजय अधूरी है।

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सच, ख़ामोशी और मन की वेदना को दर्शाती हिंदी कविता की प्रतीकात्मक तस्वीर

कविता कब तक सच कह पाएगी ?

यह कविता मन की वेदना, बिखरती कल्पनाओं, रिश्तों की उलझनों और सामाजिक परिस्थितियों से उपजी बेचैनी की अभिव्यक्ति है। जब शब्द मौन होने लगते हैं और सच कहना कठिन हो जाता है, तब कविता अपने अस्तित्व, संवेदना और ज़मीर को बचाए रखने का सवाल उठाती है।

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प्रेम की प्रतीक्षा में खड़ी स्त्री और पलाश के फूलों को दर्शाता भावपूर्ण दृश्य

तुम्हारे ख़्वाबों में आने की चाह

किसी की ज़िंदगी में शामिल होने, उसके मन की ख़ामोशी समझने और उसके ख़्वाबों में जगह पाने की चाह को व्यक्त करती एक संवेदनशील प्रेम कविता।

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माता-पिता के प्रति आभार और कृतज्ञता व्यक्त करती भारतीय महिला

आभार

आभार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, विनम्रता और कृतज्ञता का भाव है। यह कविता हमें ईश्वर, माता-पिता, शिक्षकों और मित्रों के प्रति आभार व्यक्त करने तथा जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

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भारतीय परिवार में माँ, पिता और किशोर बेटे के बीच व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपसी समझ को दर्शाता दृश्य

मुझे स्पेस चाहिए, स्पेस

क्या परिवार में प्यार का मतलब हर पल निगरानी करना है? यह कविता माँ, पिता और बच्चों के बीच स्पेस, स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और आपसी समझ की जरूरत को रोचक संवाद के माध्यम से सामने लाती है।

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खिड़की के पास बैठी स्त्री, जिसकी आँखों में अधूरे सपनों और पुरानी यादों की उदासी है।

फिर वही सपना

कुछ ख़्वाब आँखों में पलते हैं, कुछ दहलीज़ तक आकर लौट जाते हैं। ‘फिर वही सपना’ एक ऐसी भावुक कविता है, जिसमें अधूरी ख़्वाहिशों, अतीत की परछाइयों और बिखरते सपनों की पीड़ा को सुई-धागे के सुंदर रूपक के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

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आत्मविश्वास और साहस के साथ आगे बढ़ती आधुनिक भारतीय लड़कियाँ

ये आजकल की लड़कियाँ

‘ये आजकल की लड़कियाँ’ एक ऐसी कविता है, जो पुरानी और नई पीढ़ी की सोच के अंतर को सामने लाती है। यह कविता आज की लड़कियों के आत्मविश्वास, साहस और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता को स्वर देती है। अब लड़कियाँ चुपचाप सब कुछ सहने के बजाय सही और गलत के बीच फर्क करना जानती हैं। वे बराबरी का हक माँगती ही नहीं, बल्कि अपने दम पर हासिल भी करती हैं। यह कविता बदलते दौर की उस नारी शक्ति को समर्पित है, जो किसी की सोच या बंदिशों से नहीं डरती और अपने सपनों के साथ आसमान छूने का हौसला रखती है।

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राष्ट्रीय कवि संगम नवी मुंबई की प्रथम काव्य गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकार

राष्ट्रीय कवि संगम, नवी मुंबई की प्रथम काव्य गोष्ठी संपन्न

राष्ट्रीय कवि संगम, नवी मुंबई की प्रथम काव्य गोष्ठी 9 अक्टूबर को केंद्रीय विहार, सीवुड्स में आयोजित हुई। डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद गांई की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में साहित्यकारों ने काव्य पाठ कर राष्ट्र जागरण में कलमकारों की भूमिका पर जोर दिया।

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सूखी धरती पर उगता एक छोटा हरा अंकुर, जीवन और संवेदनाओं की नमी का प्रतीक

थोड़ी सी नमी बाकी रहने दो

जब मन से संवेदनाएँ सूखने लगें और जीवन से प्रेम, करुणा तथा ममता कम होने लगे, तब थोड़ी-सी नमी बचाए रखना जरूरी हो जाता है। यह कविता इंसानियत और प्रकृति के अस्तित्व को बचाने के लिए मन में संवेदनाओं की नमी बनाए रखने का संदेश देती है।

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