
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
हँसते हुए चेहरे के पीछे की फ़जीहत नज़र आती है,
झुकी हुई नज़रों में भी शरारत नज़र आती है।
अंदर से पूरी तरह बिखर चुकी हूँ,
बाहर से सिर्फ़ ख़ामोशी नज़र आती है।
चेहरे पर झूठी मुस्कान लिए रहता है वह,
ज़माने को क्या दिखाएँ, बस यही शक्ल नज़र आती है।
यहाँ हर कोई मतलब का रिश्ता निभाता है,
दोस्त बनकर भी दुश्मनी नज़र आती है।
मैंने तो अपना दिल साफ़ रखा था,
मगर तुम्हें हर बात में झूठी शिकायत नज़र आती है।
किसी के जज़्बातों से यूँ ही खेल जाते हो,
चेहरे पर केवल मासूमियत नज़र आती है।
गुज़रे लम्हों को याद करती हूँ जब, ‘पूनम’,
तेरी वही खुश रहने की हिदायत नज़र आती है।

बहुत सुंदर 👌