हिंदी कविता
तुम वही हो?
प्रेम के अभाव से मिलन की उत्कंठा तक और सपनों से आत्मपहचान तक, ‘तुम वही हो?’ मनुष्य के भीतर चलने वाले भावनात्मक संसार को शब्द देती एक संवेदनशील कविता है।
हरसिंगार धरा पर बिखर गई
हरसिंगार के धरा पर झरने को आधार बनाकर रची गई यह कविता स्नेह, समर्पण और आश्रय की तलाश को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है।
प्रेम की छोंक
जब प्रेम केवल स्पर्श नहीं, बल्कि भीतर तक उतरती हुई अनुभूति बन जाए, तब संवेदनाएँ भी नए अर्थ पाने लगती हैं. यह कविता प्रेम की उसी कोमल और आत्मीय अनुभूति को शब्द देती है.
अधूरे सपने
संध्या यादव, मुंबई सुनो जान… लोग कहते हैं, थके शरीर को नींद पत्थर पर भी आ जाती है और ऐसी ही गाढ़ी कमाई वाली नींद को मिलते हैं सपने… लोग ये भी कहते हैं कि सुबह के सपने सच होते हैं। मुझे नींद तो नहीं आई, मगर अक्सर झपकी लगी। ट्रेन में हैंडल पकड़े, एक…
“मुझे फ़र्क नहीं पड़ता”
कभी किसी की मौजूदगी सुकून देती है, लेकिन उसकी गैरमौजूदगी जिंदगी को रोक नहीं पाती। यह कविता प्रेम, आत्मनिर्भरता, तन्हाई और खामोशी के उसी खूबसूरत एहसास को शब्द देती है।
कहा अनकहा, सुना अनसुना
कभी मन बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे मौन रहने पर मजबूर कर देती हैं। ‘कहा अनकहा, सुना अनसुना’ इसी मौन, दूरी और अनकही भावनाओं की अभिव्यक्ति है।
यादों का झरोखा
बीते लम्हों की खुशबू, पुरानी हँसी और अनकही बातें जब यादों के झरोखे से लौटती हैं, तो मन में एक मीठी नमी उतर आती है।
