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आधी खुली किवाड़ से बाहर झाँकती एक चिंतनशील भारतीय स्त्री, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा का प्रतीक।

गुम औरतें

आधी खुली किवाड़ों से बाहर झाँकती वे स्त्रियाँ, जिन्होंने सीमाओं के भीतर रहकर भी खुले आकाश का सपना देखा था। समय के साथ वे कहीं गुम-सी हो गईं, लेकिन उनकी इच्छाएँ, मुस्कानें और स्वतंत्रता की आकांक्षा आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।

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सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती हिंदी कविता, जिसमें चरित्र, संस्कार और आंतरिक सुंदरता की महत्ता का वर्णन किया गया है।

सीरत और सूरत

बाहरी सुंदरता समय के साथ फीकी पड़ सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार, चरित्र और सौम्यता जीवनभर व्यक्ति की पहचान बने रहते हैं। सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती यह कविता पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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जीवन के कठिन मार्ग पर अकेला चलता एक व्यक्ति, चारों ओर घना जंगल और पथरीला रास्ता, संघर्ष और आत्मचिंतन का प्रतीकात्मक दृश्य।

ज़िंदगी

ज़िंदगी जितनी सरल दिखाई देती है, उतनी होती नहीं। यह कविता जीवन के संघर्ष, रिश्तों की बदलती परिभाषा, मोह-माया और मानव अनुभवों की गहराइयों को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है।

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रसोई में काम करती एक भारतीय माँ, चेहरे पर थकान के बावजूद संतोष और ममता की मुस्कान, परिवार के प्रति समर्पण और त्याग को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

माँ होना ही कठिन लगा

माँ को बचपन में सिर्फ एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में देखा था, लेकिन समय के साथ समझ आया कि माँ होना संसार का सबसे कठिन और सबसे सुंदर दायित्व है। यह कविता माँ के त्याग, धैर्य और मौन प्रेम को श्रद्धांजलि है।

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अलमारी में टंगे रंग-बिरंगे लेहंगे को देखती एक भारतीय महिला, शादी और पारिवारिक यादों में खोई हुई, भावनात्मक और यथार्थवादी दृश्य।

रिश्ते

खुश्बू गोयल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) वो लेहंगा, जो भैया की शादी में लिया था,उसकी भी बड़ी अजीब कहानी है। जब भी अलमारी खोलूँ,माँ को बस वही नज़र आता है,और हर बार की तरहउनका कहना शुरू हो जाता है “इतना भारी लेहंगा क्यों लिया था,जब तुझे पहनना ही नहीं था?” बस एक बार भैया की शादी…

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पुरानी पुस्तकों, पांडुलिपियों और शब्दों के प्रतीकों के बीच विचारमग्न साहित्यकार का कलात्मक दृश्य, जो भाषा, समय और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाता है।

लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त

प्रो. डॉ. मनु की कविता “लफ़्ज़ों की नसों में बहता हुआ वक़्त” शब्दों, अर्थों और उनकी ऐतिहासिक जड़ों की एक गहन साहित्यिक यात्रा है। यह रचना बताती है कि हर लफ़्ज़ अपने भीतर समय, संस्कृति और मानवीय अनुभवों का एक पूरा संसार समेटे रहता है।

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अकेला व्यक्ति अपनी भावनाओं और दर्द के साथ मौन बैठा हुआ, सुनने वाले की तलाश में

‘विलुप्त श्रोता’

‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

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अपने पुत्र को स्नेह और आशीर्वाद देती हुई भारतीय माँ का भावुक चित्र

कुलदीपक

“सुपुत्र” एक भावनात्मक हिंदी कविता है, जिसमें माँ अपने पुत्र को ईश्वर का वरदान, घर का उजियारा और अपने हृदय का अंश मानते हुए उसके प्रति अपना असीम प्रेम और आशीर्वाद व्यक्त करती है।

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मोर मुकुट धारण किए भगवान श्रीकृष्ण, हाथ में बांसुरी, वृंदावन के कुंजों में राधा और गोपियों के साथ दिव्य रासलीला का मनमोहक दृश्य।

श्री कृष्ण

ज बिहारी श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा, राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम और वृंदावन की रासलीला का सुंदर काव्यात्मक चित्रण। माखनचोर नंदलाल की बाल लीलाओं से लेकर उनके मनमोहक स्वरूप तक, यह कविता भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक आनंद का मधुर संदेश देती है। श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और समर्पण से ओतप्रोत यह रचना भक्तों के हृदय को भाव-विभोर कर देती है।

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