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उज्जैन रेलवे स्टेशन का डिजाइन फिर बदला

उज्जैन रेलवे स्टेशन की डिजाइन बदलने के कारण काम एक बार फिर लेट हो गया है। बताया जा रहा है कि अब स्टेशन का नई डिजाइन में निर्माण सिंहस्थ के बाद ही हो सकेगा।15 महीने पहले उज्जैन समेत इंदौर, नागदा, खाचरौद, आलोट और रतलाम मंडल के 11 रेलवे स्टेशनों का पीएम मोदी ने भूमि पूजन किया था। इनमें से उज्जैन को छोडक़र बाकी सभी स्टेशनों पर कार्य शुरू हो चुका है। नागदा स्टेशन का कार्य अंतिम चरण में है।

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बस अब और नहीं 

सान्वी ने सुबह की सारी व्यस्तताओं से निवृत्त होकर बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों को निहारना शुरू किया। उसी समय उसके भीतर लंबे समय से चल रहे संघर्ष और आंतरिक तूफ़ान ने नया रूप ले लिया। अतीत के घाव, निराशा और खुद से होने वाली आत्मग्लानि ने उसे झकझोर दिया। और तभी उसने ठान लिया. बस, अब और नहीं!”उसने अपने अनवरत युद्ध को विराम देने का साहस जुटाया, और अपने अंतर्मन पर पूर्ण नियंत्रण पाकर आत्मा की जीत का अनुभव किया।

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एक विरह ऐसा भी…

वियोग के उस क्षण में कवि को उसकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता दोनों दिखाई देते हैं। बिछड़ते समय दोनों ने कुछ न कुछ खोया था. एक ने उदासी को सहा, दूसरे ने निश्चय को अपने होंठों पर थामे रखा। इस टूटते हुए रिश्ते के बीच भी कवि के भीतर एक मौन विश्वास जन्म लेता है कि प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

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ना झुकती, ना रुकती — मैं नारी हूं

मैं नारी हूं। गलतियां करती हूं, पर उन्हें दोहराती नहीं। गलती से सबक लेकर आगे बढ़ना जानती हूं। सीमाओं में रहकर भी सफलता को गले लगाना चाहती हूं। अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं तय करती हूं, जिसे कोई लांघकर अंदर नहीं आ सकता और कोई बहरूपिया मुझे रेखा पार ले जा नहीं सकता। मैं उन्नति के शिखर को छूना चाहती हूं, पर अपने दायरों में रहकर। किसी को कुचलकर आगे बढ़ना या किसी समझौते के कारण झुकना नहीं चाहती। सफलता न मिले तो भी मंज़ूर है, लेकिन अपने किरदार को गिराना नहीं चाहती। अगर मेरे परिवार को बुरी नज़रें छू जाएं, तो काली दुर्गा बनने में मुझे देर नहीं लगती। ज़रूरत पड़े तो कंधे से कंधा मिलाने में कभी नहीं कतराती। मुझे बराबरी का दर्जा मिले या न मिले, पर मेरी शान इससे कभी घटती नहीं।

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“यादों का लिफाफा”

इस कविता में एक संतान अपनी माँ की यादों और सीख को भावनात्मक रूप में संजोती है। माँ द्वारा दिए गए एक पुराने खत में छिपे भाव उसे आज भी संबल देते हैं। माँ की कही बातें, उसके एहसास, और उसका साथ — सब कुछ आज भी दिल की अलमारी में सजे हुए हैं। वह मानती है कि वह माँ जैसी नहीं बन सकी, लेकिन माँ से जीवन की सच्ची बातें सीखी हैं — मोहब्बत, यारी और कठिनाइयों में टूटे बिना जीना। उजालों की प्रतीक्षा में अंधेरों से जो उसने पाया, वो भी माँ की दी हुई रोशनी से ही संभव हो पाया।

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अरावली : सभ्यता, प्रकृति और भविष्य की पुकार

अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की सबसे पुरानी प्राकृतिक धरोहर और पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है। नीतिगत परिभाषाओं के नाम पर यदि इसे कानूनी संरक्षण से बाहर किया गया, तो अवैध खनन, जल संकट और मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ेगा। अरावली को बचाना आज केवल पर्यावरण नहीं, देश के भविष्य को बचाने का सवाल है।

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पुणे में वसंतोत्सव का समापन राहुल देशपांडे के बहारदार राग चंद्रकंस से हुआ। कुमार गंधर्व परंपरा, युवा कलाकार और शास्त्रीय संगीत के भविष्य पर विशेष रिपोर्ट।

सुरों में विनम्रता, स्वर में विरासत

राहुल देशपांडे के सुमधुर राग चंद्रकंस गायन के साथ पुणे के वसंतोत्सव का भावपूर्ण समापन हुआ। शास्त्रीय संगीत की परंपरा, विनम्रता और भविष्य का सुर-संदेश इस मंच से गूंजा।

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परीक्षा हॉल में चिंतित छात्र, NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता दृश्य।

नीट पेपर लीक : जिम्मेदार कौन?

NEET पेपर लीक केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के सपनों और विश्वास पर गहरा आघात है। वर्षों की मेहनत, परिवारों के त्याग और युवाओं के संघर्ष के बाद जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं, तो केवल परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि पूरा भरोसा बिखर जाता है। अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो, दोषियों को कठोर सजा मिले और ऐसी पारदर्शी प्रणाली बनाई जाए जहाँ मेहनत का मूल्य पैसों और पहुंच से अधिक हो।

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गर्मियों में ताजे फल खाते हुए खुश बच्चे और हेल्दी डाइट का दृश्य

हाइड्रेशन से इम्यूनिटी तक, सही फलों से रखें बच्चों को फिट

गर्मियों में बच्चों की सेहत बनाए रखने के लिए सही फलों का चयन बेहद जरूरी है. तरबूज, आम, केला और संतरा जैसे फल न केवल हाइड्रेशन देते हैं बल्कि इम्यूनिटी और एनर्जी भी बढ़ाते हैं.

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रावण बहुतेरे

आज रावण के पुतले भले ही जलाए जाएँ, लेकिन वास्तविक रावण अब दस सिर वाले नहीं हैं। वे एक सिर वाले हैं और समाज में असंख्य रूपों में मौजूद हैं। जहाँ बाहर श्याम वस्त्रों में रावण का प्रतीक जलता है, वहीं श्वेत वस्त्रों में छुपे अनेक रावण रोज़ हमारे बीच घूमते हैं। यह रावण अब केवल सीता-हरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर दिन न जाने कितनी सीताओं का अपहरण और चीर-हरण होता है। मासूमियत की नीलामी होती है और हवस की भट्टी में उसका भस्म किया जाता है। असली चुनौती इन सफेदपोश रावणों का दहन करने की है। सच्चा विजयदशमी तभी होगी जब इनका सर्वनाश किया जाए।

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