नारी तू! नारायणी स्वरूपा
नारी केवल एक संबंध नहीं, बल्कि ममता, त्याग, साहस, करुणा और शक्ति का अद्भुत संगम है। “नारी तू! नारायणी स्वरूपा” कविता स्त्री के विविध रूपों और उसके अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक नमन करती है।

नारी केवल एक संबंध नहीं, बल्कि ममता, त्याग, साहस, करुणा और शक्ति का अद्भुत संगम है। “नारी तू! नारायणी स्वरूपा” कविता स्त्री के विविध रूपों और उसके अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक नमन करती है।
गर्मी के एक दोपहर में, सुदीप बनर्जी के अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही है। निधि, जो अपने पति अमितेश के उपेक्षात्मक और हिंसक व्यवहार से वर्षों से जूझ रही है, यह घोषणा करती है कि मुखाग्नि सुदीप का बेटा सुजीत देगा—एक सच्चाई जिसे अब तक कोई नहीं जानता था। विरोध और संदेह के बावजूद, निधि यह साबित करने पर अडिग रहती है कि सुजीत सुदीप का खून है।
सुदीप के गुजरने के बाद, निधि को उसकी एक रिकॉर्डेड ऑडियो क्लिप मिलती है, जिसमें वह अपनी आखिरी ख्वाहिश व्यक्त करता है—कि निधि उसकी मृत्यु के बाद भी उसके नाम का सिंदूर लगाए और उसकी पत्नी की तरह जीवन बिताए। निधि इस इच्छा को उसी रात पूरी करती है।
कुछ दिन बाद, वकील की उपस्थिति में सुदीप की वसीयत पढ़ी जाती है, जिसमें उसकी सारी संपत्ति निधि और उसके बाद सुजीत के नाम की जाती है, और निधि से कहा जाता है कि वह उसकी विधवा नहीं बल्कि सुहागन की तरह इस घर में रहे। यह सब सुनकर सुदीप की माँ निधि को अपनाती है और अपने पोते को गले लगाती है। यह क्षण एक रिश्ते के खोने के दर्द के साथ-साथ नए अपनत्व और स्वीकृति के सुख को भी दर्शाता है।
सविता सिंह मीरा से हुई एक साहित्यिक मुलाकात धीरे-धीरे बहन और दोस्त के आत्मीय रिश्ते में बदल गई। उनकी सहजता, साहित्य के प्रति समर्पण और स्नेहिल स्वभाव को याद करते हुए यह संस्मरण मीरा दी के साथ जुड़ी खूबसूरत यादों और उस अपनापन को सामने लाता है, जो उन्हें खास बनाता है।
तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले में पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट में 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घायल और लापता बताए जा रहे हैं। राहत-बचाव कार्य जारी है।
यह कविता आधुनिक जीवन के दिखावे और सादगी के बीच के द्वंद्व को बेहद मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती है। कवि यह संदेश देता है कि रिश्तों में ब्रांड्स और बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सच्चाई और सादगी ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। प्रेम का असली रूप व्यक्ति के भीतर होता है, न कि उसके पहनावे या स्टेटस में।
तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।
बच्चे का जन्म केवल एक नए जीवन का आगमन नहीं होता, बल्कि उसी क्षण एक औरत का भी पुनर्जन्म होता है — एक मां के रूप में। मातृत्व का यह चमत्कार औरत के भीतर प्रेम, त्याग और जिम्मेदारी की एक नई दुनिया खोल देता है। जैसे-जैसे बच्चा सीखता है, वैसे-वैसे मां भी सीखती है; यही जन्म का दूसरा चमत्कार है — एक मां का अवतरण।
मुझे किसी अनदेखे से प्यार है ऐसा प्यार जो किसी चेहरे, आवाज़ या उपस्थिति का मोहताज नहीं. वह बस मेरी कल्पना में बसा है, मेरी सोच में साँस लेता है. लोग कहते हैं, यह पागलपन है, पर अगर दिल को सुकून मिलता है तो इसे क्या नाम दूँ? एक बार किसी को दिल में जगह दे दी, तो वही मेरा सच बन गया. मुझे झूठ से हमेशा ऩफरत रही है, इसलिए यह एहसास भी पूरी सच्चाई से भरा है. मुझे जीवन के फूल ही नहीं, उसके काँटे भी प्रिय हैं क्योंकि दर्द भी तो किसी गहराई से आता है. मुझे उन खिड़कियों से प्यार है, जहाँ से मैं दुनिया को देखती हूँ वही खिड़कियाँ शायद उस अनदेखे तक पहुँचने का रास्ता हैं.
महिदपुर रोड के श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के दौरान साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी महाराज ने धर्मसभा में लोभ को सबसे खतरनाक कषाय बताते हुए कहा कि लोभ व्यक्ति को दुर्गति, विनाश और पतन की ओर ले जाता है. इस अवसर पर 51 से अधिक सिद्धितप तपस्वियों की तपस्या जारी है और 20 अगस्त से नवकार महामंत्र आराधना का शुभारंभ होगा.
जब मन से संवेदनाएँ सूखने लगें और जीवन से प्रेम, करुणा तथा ममता कम होने लगे, तब थोड़ी-सी नमी बचाए रखना जरूरी हो जाता है। यह कविता इंसानियत और प्रकृति के अस्तित्व को बचाने के लिए मन में संवेदनाओं की नमी बनाए रखने का संदेश देती है।