पूनम सिंह और नीलम पेड़ीवाल सम्मानित

इंदौर के मानस भवन सभागार में आयोजित साहित्य सम्मान समारोह में पूनम सिंह और नीलम पेड़ीवाल को सम्मानित करते हुए अतिथि एवं आयोजक।

विश्व हिंदी प्रचारिणी महासभा एवं यूनिक यूनिवर्सल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के आयोजन में मिला गौरव

पूनम सिंह “वत्सला” जमशेदपुर ( झारखंड) की रिपोर्ट

इंदौर। विश्व हिंदी प्रचारिणी महासभा, इंदौर (मध्य प्रदेश) तथा यूनिक यूनिवर्सल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, इंदौर (मध्य प्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में 31 मई 2026 को श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर के मानस भवन सभागार में आयोजित भव्य सम्मान समारोह, कवि सम्मेलन एवं “पांडुलिपि का इतिहास और उसका महत्व” विषयक व्याख्यान कार्यक्रम में साहित्यकारों और कवियों का सम्मान किया गया। इस अवसर पर पूनम सिंह और नीलम पेड़ीवाल को साहित्य क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान एवं रचनात्मक समर्पण के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के संयोजक एवं संस्थापक अध्यक्ष महाकवि डॉ. प्रेमानंद सरस्वती रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने की, जबकि डॉ. प्रकाश कड़ौतिया मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. योगेंद्र शुक्ला, डॉ. अमरजीत राम एवं डॉ. बसंत नारायण सिंह ने विशेष अतिथि के रूप में कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात निधि दीक्षित शर्मा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय और साहित्यिक रंगों से भर दिया। आगंतुक अतिथियों का स्वागत महाकवि डॉ. प्रेमानंद सरस्वती द्वारा मोती की मालाओं से किया गया।

कार्यक्रम में आयोजित कवि सम्मेलन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा, जिसमें पूनम सिंह और नीलम पेड़ीवाल की प्रभावशाली काव्य प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। दोनों रचनाकारों की प्रस्तुति को सभागार में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने खूब सराहा।इसी अवसर पर साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा और समर्पण के लिए पूनम सिंह और नीलम पेड़ीवाल को “स्वामी श्यामानंद सरस्वती ‘रोशन’ स्मृति सम्मान” तथा “कवि सम्मेलन सम्मान 2026” से अलंकृत किया गया।

सम्मान स्वरूप उन्हें मोती की माला, प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए। साथ ही यूनिक यूनिवर्सल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की ओर से प्रमाण-पत्र एवं पदक देकर भी सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में “पांडुलिपि का इतिहास और उसका महत्व” विषय पर आयोजित व्याख्यान में पांडुलिपियों की ऐतिहासिक धरोहर और ज्ञान-संरक्षण में उनकी भूमिका पर विस्तृत विचार रखे गए। यह आयोजन हिंदी साहित्य, सांस्कृतिक चेतना और रचनात्मक अभिव्यक्ति के संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में यादगार रहा।

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