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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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बात करते समय मां का चेहरा छूता हुआ छोटा बच्चा

बात करते-करते बच्चा आपका चेहरा क्यों छूने लगता है ?

क्या आपका बच्चा बात करते समय बार-बार आपके गाल, नाक या भौंहों को छूता है? बचपन की यह छोटी-सी आदत प्यार जताने, जिज्ञासा, अपनापन या माता-पिता का ध्यान पाने से जुड़ी हो सकती है। जानिए इस व्यवहार के संभावित कारण और बच्चे को प्यार के साथ व्यक्तिगत सीमाएं सिखाने का सही तरीका।

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तीज पर्व पर झूले पर बैठी महिला और शिव-पार्वती की पूजा

तीज

तीज केवल श्रृंगार और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है. प्रस्तुत कविता में शिव-पार्वती के माध्यम से तीज के आध्यात्मिक और भावनात्मक पक्ष को अभिव्यक्त किया गया है.

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राख में भी शेष चिंगारी

मैंने ठहरना सीखा है— क्योंकि भाग जाना हमेशा हार नहीं, पर ठहरना ही सच्ची जीत है। आँसुओं की छाँव में मुस्कराना मेरा स्वभाव है, और यही मेरी पहचान भी। धूप ने जलाया, आँधियों ने तोड़ा, फिर भी हर बार राख से उठी हूँ — अपनी ही चिंगारियों की गर्मी से। शब्दों के बाण चुभे, पर मैंने मौन को कवच बना लिया; समय की नदी में बहते हुए भी मैंने उफनाई लहरों पर बाँध बनने का साहस पाया।
टूटते चाँद की तरह कभी मन भी बिखरता है, पर उजाला कम नहीं होता। मैं जानती हूँ कि पीड़ा को शीतलता में कैसे बदलना है — जैसे मंदाकिनी बनकर अपने ही घावों को धोना। मैं नहीं भागती, क्योंकि हर ठहराव में मैं अपनी अस्मिता को फिर से गढ़ती हूँ। यही मेरी शक्ति है, यही मेरी पहचान।

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युद्ध और उसके परिणामों पर चिंतन को दर्शाता एक प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें धुएँ और विनाश के बीच खड़ा एक अकेला व्यक्ति संघर्ष और मानवता पर विचार कर रहा है।

युद्ध की समझ…

युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।

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नारी सम्मान और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक एक आत्मविश्वासी भारतीय महिला

“नारी की गरिमा”

“नारी की गरिमा” कविता स्त्री के सम्मान, सुरक्षा और न्याय के मुद्दों पर समाज से तीखे प्रश्न करती है। यह रचना महिलाओं के प्रति भेदभाव, अपराध और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करते हुए आत्मसम्मान और समानता की आवाज़ बुलंद करती है।

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फोन पर माता-पिता से तलाक पर बहस करती महिला, भावनात्मक पारिवारिक संघर्ष का दृश्य।

बसा बसाया घर

‘बसा-बसाया घर’ एक ऐसी मार्मिक लघुकथा है, जिसमें बेटी अपने तलाक के फैसले पर अडिग रहती है। माता-पिता उसे समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बातचीत के दौरान वह उनके अतीत का ऐसा सच सामने रख देती है, जिससे दोनों निरुत्तर हो जाते हैं। कहानी रिश्तों में विश्वास, दोहरे मापदंड और आत्मसम्मान जैसे गंभीर विषयों को उजागर करती है। यह कथा बताती है कि दूसरों को सलाह देना आसान है, लेकिन जब सच सामने आता है तो अपने ही बनाए मूल्य टूट जाते हैं।

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भारतीय विद्यालय में विद्यार्थियों को पढ़ाते शिक्षक

शिक्षा : उज्ज्वल भविष्य और सशक्त समाज की आधारशिला

शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक मूल्यों और आत्मनिर्भरता का आधार है। प्रधानाचार्य श्री अनिल पाटील का यह आलेख बताता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षक-अभिभावक सहयोग और आधुनिक तकनीक के संतुलित उपयोग से सशक्त समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण कैसे संभव है।

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मेरा घर कौन-सा…?

यह कविता एक स्त्री की आत्मसंवेदना और उसके भीतर के संघर्ष का मार्मिक चित्रण करती है। वह बताती है कि कैसे समाज और परिवार की परंपराओं के बीच जीते-जीते वह स्वयं अपने ही घर में पराई बन जाती है। मन की पीड़ा इतनी गहरी है कि वह धीरे-धीरे उस “गैरपन” की स्थिति की अभ्यस्त हो जाती है — जैसे किसी ने अपनी पहचान को कुहासे में ब्याह दिया हो।
कविता में “एक धुंध से निकलकर दूसरी धुंध में” जाना, जीवन की निरंतर उलझनों और अस्पष्टताओं का प्रतीक है। वर्जनाओं से घिरी हुई स्त्री फिर भी अपनी “कामनाओं” को निर्बाध बहने देती है, क्योंकि वही उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। अंत में “मेरा घर कौन-सा…?” यह प्रश्न केवल भौतिक घर का नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आत्मीयता की खोज का प्रतीक बन जाता है। यह कविता स्त्री-मन की उस पीड़ा को उजागर करती है, जो प्रेम, संबंध और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पहचान तलाशने का प्रयास कर रही है।

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खुशबू से बंधा पहला प्यार

यह कविता मानो खुशबुओं का एक जीवन वृत्तांत है। हर स्मृति, हर अनुभव एक विशेष सुगंध से जुड़कर अमर हो गया है। पहली बारिश की मिट्टी की महक, प्रियतम की मीठी बातों की महक, किताबों से उठती खुशबू, हाथों में महंदी की गंध, गहनों में समाया पसीना, खिड़की से आती रातरानी की महक और तन पर चंदन की सुगंध—सब कुछ उसके प्रेम और साथ के अनुभवों से गुँथा हुआ है। यह केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन अदृश्य अनुभूतियों का बयान है जो इंद्रियों से परे जाकर हृदय में स्थायी छाप छोड़ देती हैं। हर खुशबू, एक स्मृति बनकर जीती है और हर स्मृति में प्रेम की गहराई झलकती है।

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