बुढ़ापे की व्यथा
“बुढ़ापे की व्यथा” एक मार्मिक कविता है जो वृद्धाश्रम में बैठे माता-पिता की पीड़ा, उपेक्षा और टूटते पारिवारिक मूल्यों की करुण सच्चाई को उजागर करती है। यह रचना समाज को आईना दिखाती है और संतान को अपने कर्तव्यों की याद दिलाती है।
इश्क़ की इंतहा
राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।
मुझे अच्छा नहीं लगता…
“मुझे अच्छा नहीं लगता” एक संवेदनशील हिंदी कविता है, जो एक गृहिणी के अनदेखे श्रम, भावनात्मक अकेलेपन और उपेक्षा के दर्द को उजागर करती है। यह रचना उन स्त्रियों की आवाज़ है, जो परिवार के लिए सब कुछ समर्पित कर देती हैं, लेकिन बदले में मान-सम्मान की कमी महसूस करती हैं।
मोहब्बत एक ज़हर
“मोहब्बत एक ज़हर” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो प्रेम में अपमान, सामाजिक भय, और माता-पिता के सम्मान के बोझ तले टूटती एक बेटी की पीड़ा को दर्शाती है। यह कविता युवा भावनाओं, पछतावे और परिवार की प्रतिष्ठा के संघर्ष को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है।
तो अच्छा होता
“तो अच्छा होता” एक भावनात्मक हिंदी कविता है, जो इंतज़ार, अधूरी मोहब्बत और टूटे वादों की पीड़ा को सरल लेकिन गहरे शब्दों में व्यक्त करती है.
फिल्म शूटिंग से रेलवे की कमाई 1.72 करोड़ रुपये पार
पश्चिम रेलवे ने 2025–26 में फिल्म शूटिंग से 1.72 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड आय अर्जित की है. सिंगल विंडो अनुमति प्रणाली और वंदे भारत एक्सप्रेस में शूटिंग की स्वीकृति ने गैर-किराया राजस्व बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
अपने ही रंग में रंग लो…
“मोहे अपने ही रंग में रंग लो गिरधारी” फागुन और होली के उल्लास में डूबी एक गहन आध्यात्मिक रचना है। यह कविता बाहरी रंगों की चंचलता से आगे बढ़कर उस दिव्य प्रेम की तलाश करती है, जो आत्मा को भीतर तक भिगो दे। ब्रज की होली, उड़ते गुलाल, ढोल-मंजीरे की थाप और सखियों की हंसी के बीच कवयित्री का मन केवल एक ही रंग चाहता है
गुलाल, गीत और मुस्कान
मातृशक्ति भजन मंडली न्यू शिवाजी नगर के फाग उत्सव 2026 में राधा-कृष्ण झांकी, भजन और रंग-गुलाल की मस्ती ने माहौल को भक्तिमय और आनंदमय बना दिया।
मुंबई में ‘बतरस’ ने रचा प्रेम का बहुरंगी महोत्सव
बतरस’ द्वारा आयोजित ‘है प्रेम जगत में सार’ कार्यक्रम में कवि विनोद दास ने प्रेम को सांस्कृतिक प्रतिरोध बताते हुए समाज में संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। कविता, गीत और नाट्य प्रस्तुतियों ने शाम को यादगार बना दिया।
