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माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

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“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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खिड़की के पास बैठा व्यक्ति, मन की थकान और अकेलेपन को दर्शाता दृश्य

“मन थके तो कौन?”

मन की थकान वह पीड़ा है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। “मन थके तो कौन?” कविता इसी अदृश्य दर्द को उजागर करती है, जहाँ तन की बीमारी का इलाज तो मिल जाता है, लेकिन मन के घाव केवल एक सच्चे अपने की उपस्थिति से ही भरते हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा सहारा सिर्फ सुनने वाला एक दिल होता है।

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अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

आत्ममुग्धता

धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।

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कुछ नजारे ऐसे…

कुछ नज़ारे ऐसे होते हैं जो पूरी ज़िंदगी को समेटे रहते हैं। वे लौटकर फिर कभी नहीं आते, लेकिन जाते हुए भी दिखाई नहीं देते। कभी वे प्रेम-रस से भरे बादलों की तरह मन के भँवर को पागल बना देते हैं, तो कभी यादों के आकाश में उड़ते पंछियों की तरह हमें बीते दिन और रातें लौटा लाने को मजबूर करते हैं।

कुछ नज़ारे आँखों के काजल जैसे होते हैं, जो मन में फूलों की डोली सजा देते हैं और अपनी रंग-बिरंगी खुशबू से जीवन भर को महका जाते हैं। जब वे याद आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ले आते हैं और यह अहसास कराते हैं कि जीवन में कोई प्यारा साथ है, जिसके साथ ज़िंदगी जीने लायक बनती है।

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पुणे: प्रॉपर्टी टैक्स अभय योजना बढ़ाने का प्रस्ताव खारिज pmc building

पुणे: प्रॉपर्टी टैक्स अभय योजना बढ़ाने का प्रस्ताव खारिज

पुणे नगर निगम ने प्रॉपर्टी टैक्स अभय योजना की अवधि 31 मार्च तक बढ़ाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। मनपा आयुक्त नवल किशोर राम ने स्पष्ट किया कि मार्च के अंतिम 15 दिनों में विशेष प्रॉपर्टी टैक्स वसूली अभियान चलाया जाता है, इसलिए योजना की अवधि बढ़ाना उचित नहीं होगा। कांग्रेस गुटनेता द्वारा योजना बढ़ाने की मांग के बावजूद प्रशासन ने इसे स्वीकार नहीं किया

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पैंतीस-चालीस की स्त्री

“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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 सोच बदल गई

कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.

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भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में सजी नवविवाहिता अपनी माँग में सिंदूर धारण किए हुए, जीवनसाथी के साथ प्रेम, विश्वास और वैवाहिक समर्पण के भाव को दर्शाती हुई।

सिंदूर तेरे नाम का

“सिंदूर तेरे नाम का” प्रेम, विश्वास और आजीवन समर्पण की भावनाओं को व्यक्त करती एक भावपूर्ण हिंदी कविता है। इसमें जीवनसाथी के साथ जन्म-जन्मांतर के बंधन, अटूट विश्वास और साथ निभाने की कामना को कोमल शब्दों में पिरोया गया है। कविता भारतीय वैवाहिक संस्कृति में सिंदूर के आध्यात्मिक और भावनात्मक महत्व को भी सुंदरता से अभिव्यक्त करती है।

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