
अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
हे गोविंद! मेरी लाज बचाओ
हे गोविंद! मेरी लाज बचाओ,
मैं औरत हूँ, ये नाज़ बचाओ।
दुशासन वस्त्र खींच रहा,
दुर्योधन जंघा पीट रहा।
हे गोविंद! मेरी लाज बचाओ,
मैं कृष्णा हूँ, यह बात बताओ।
यहाँ अपमान हो रही एक नारी,
सभा मौन बैठी है सारी।
महाराज धृतराष्ट्र और द्रोण तमाशा देख रहे,
कुलगुरु कृप मुझसे निकली आग सेंक रहे।
इस सबसे क्या लाभ है?
दाँव पर लगी आज मेरी लाज है।
मैं कहाँ आभूषण सजाऊँ,
हे गोविंद! मेरी लाज बचाओ।
मैं पांचाल नरेश की पुत्री पांचाली हूँ,
हस्तिनापुर की कुलवधु हूँ,
पर आज बिलखती द्रौपदी हूँ।
मैं यज्ञ से निकली हूँ, मैं यज्ञसेनी,
यहाँ बैठे सभी अज्ञानी।
राजमहल में ये कैसा कलयुग छा गया,
मौन रहने से प्रलय आ गया।
इस ढीठ ने खींचे मेरे केश हैं,
अहंकारियों के लिए ये काम नेक है।
शकुनि ने चौसर में कपट किया,
मुझे जीतने में न तनिक भी देर किया।
द्वारकाधीश ने मेरे वस्त्र को सिया है,
दुष्टों ने मुझे मृगनयनी कहा है।
पांडव संपत्ति के साथ बुद्धि भी खो बैठे,
श्रीकृष्ण ने मुझ पर वस्त्र सजाया,
गोविंद ने आज मुझे बचाया।!!

बहुत भावपूर्ण रचना 👌
आदरणीय मधुजी
आपने अन्य रचनाकारों की रचनाओं पर अपनी टिप्पणी देकर जो प्रेम और स्नेह प्रदर्शित किया है. वह सचमुच आपको महान बनाता है.
बेहद सुन्दर कृति
Dropadi ki pira ko apne jo apne kavya me racha hai…aapka ye adbhut prayas bahut hi sarahniya hai ..🙏🏼❣️