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प्रकृति…

प्रकृति हर पल हमें कुछ न कुछ सिखाती रहती है। ठंडी हवाएँ हमें कहती हैं कि चलते रहो, कभी मत रुको और अपना लक्ष्य पाकर ही ठहरो। चहचहाते पक्षी यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, मुस्कुराते रहो और जीवन का आनंद लो। घड़ी की टिक-टिक हमें याद दिलाती है कि समय की कद्र करो, क्योंकि एक बार बीता हुआ वक्त कभी लौटकर नहीं आता। रिमझिम बारिश की बूँदें सब्र करने का पाठ पढ़ाती हैं और बताती हैं कि धैर्य का फल सदैव मीठा होता है। वहीं, जगमगाते जुगनू यह सीख देते हैं कि अंधेरों में भी रोशनी तलाशनी चाहिए। सच तो यह है कि प्रकृति अनजाने में ही हमें जीवन के गहरे सत्य सिखा देती है, लेकिन अक्सर हम इंसान इतने नासमझ होते हैं कि उन्हें समझ नहीं पाते।

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विशाल बरगद के पेड़ की छाँव में बैठे बुजुर्ग और परिवार

बरगद की छाँव

बरगद केवल एक विशाल वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में आश्रय, ज्ञान, एकता और संस्कार का प्रतीक है। ‘बरगद की छाँव’ कविता इसी वृक्ष के महत्व और बुजुर्गों की छाया को खूबसूरती से जोड़ती है।

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…जब एक अफवाह ने हिला दिया था महू को

27 साल पहले महू के सात रास्ता स्कूल में एक टाइम बम मिलने की सूचना से हड़कंप मच गया था। संसाधनों की कमी और अफरा-तफरी के बीच प्रशासन, पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने जिस सूझबूझ से हालात को संभाला, वह आज भी यादगार बन गया है। घटना से जुड़े तत्कालीन अधिकारी आज भी इसे याद करते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

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करवा चौथ

साँझ के धुँधलके में जब दीपों की कतारें आँगन को सजाती हैं, हवा में करवा चौथ का सुगंधित उत्सव घुल जाता है। थाली में सिन्दूर, करवा में भरा प्यार — सब कुछ उस एक भाव के इर्द-गिर्द घूमता है जो समय की हर परीक्षा में अडिग रहा है। चाँद निकलने से पहले ही मन अपने चाँद को निहार लेता है — वही तो उसका सहारा है, वही उसका संसार। भूख-प्यास का एहसास प्रेम की ऊष्मा में कहीं विलीन हो जाता है। करवा की लौ झिलमिलाती है, जैसे रिश्तों की डोर — अटूट, पवित्र और उजली। प्रतीक्षा में बँधी आँखों में बस एक ही नाम गूंजता है, एक ही आकांक्षा साँसों में बसती है

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बदलता वक़्त

कभी अल्हड़ और शरारती रहे हम, अब समझदार होकर चुप्पी में जीना सीख गए हैं। मौसम, बारिश और दोस्तों संग बिताए हंगामे पीछे छूट गए। अब खुशियाँ भी मन में ही दबाकर रख लेते हैं। ज़िंदगी की राह पर निकले तो थे कहीं और, पर दिशा बदल गई और हम धीरे-धीरे बदलते गए।

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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हिंदी भाषा, हिंदी बोली

हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और आत्मीयता की अभिव्यक्ति है। कविताएँ, कहानियाँ और शास्त्रिक ज्ञान इसे जीवंत बनाते हैं। इसकी मधुर ध्वनि, सरल व्याकरण और शृंगारी रूपरेखा भावनाओं को सीधे हृदय तक पहुँचाती हैं। हिंदी हमें भारतीय संस्कृति, ज्ञान और प्रेम से जोड़ती है, और यह भाषा हमारी पहचान और गर्व का प्रतीक है।

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मुरली की धुन सुनते राधा और कृष्ण का यमुना तट पर भावुक दृश्य

 “मुरली की धुन”

राधा-कृष्ण का प्रेम केवल सांसारिक प्रेम नहीं, बल्कि भक्ति, समर्पण और त्याग का प्रतीक माना जाता है। ‘मुरली की धुन’ इसी अमर प्रेम की एक भावुक कथा है, जिसमें कृष्ण अपनी राधा से किया वचन निभाने के लिए उनके जीवन के अंतिम क्षणों में लौटकर आते हैं।

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शाकुन्तलम सम्मान 2026 के लिए चयनित जयपुर की लेखिका संतोषी

ईशमधु तलवार स्मृति शाकुन्तलम सम्मान 2026 जयपुर की लेखिका संतोषी को

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्थान की ओर से स्थापित ईशमधु तलवार स्मृति शाकुन्तलम सम्मान 2026 के लिए लेखिका संतोषी का चयन किया गया है। उन्हें उनकी पुस्तक ‘रोही की रोजड़ी’ के लिए 21,000 रुपये की सम्मान राशि, शॉल, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किया जाएगा। सम्मान समारोह 11 अक्टूबर को जयपुर में आयोजित होगा।

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