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आओ चाय बनाए …

“आओ चाय बनाए” एक भावनात्मक आमंत्रण है, जिसमें चाय बनाने की प्रक्रिया को एक प्रेमपूर्ण और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कविता सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि आत्मीयता, मिलन और घरेलू सौंदर्य की प्रतीक है। मसालों की सुगंध, शक्कर की मिठास और चाय की पत्ती की उबाल के साथ मित्रता और अपनापन भी घुलता है। यह कविता हर उस व्यक्ति को बुलाती है जो रिश्तों की गर्माहट को महसूस करना चाहता है — एक प्याले चाय के साथ।

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ख़त : सैनिकों के नाम

सीमाओं पर खड़ा सैनिक सिर्फ़ बंदूक नहीं थामे होता, वह अपने घर, अपने बच्चों की हँसी और माता-पिता की आँखों की प्रतीक्षा भी वहीं छोड़ आता है। सर्दी, गर्मी और बरसात उसके लिए मौसम नहीं, कर्तव्य की परीक्षा होते हैं। देश की शान उसके कदमों में और भारत की नींद उसकी आँखों की जाग में सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि हर दुआ, हर नमन और हर उम्मीद सबसे पहले उसी के नाम लिखी जाती है।

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अलविदा झामरी

झामरी एक ट्रांसजेंडर गोल्डन रिट्रीवर थी, जो गुमनामी में आई और चुपचाप सबकी प्रिय बनकर चली गई। माताजी मंदिर के सामने बिताया उसका शांत जीवन, अनिल परमार का स्नेह और अंत में सम्मानजनक विदाई यह सिखाती है कि करुणा और अपनापन शब्दों के मोहताज नहीं होते।

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वह इकलौती पेंट और गर्म इस्त्री

वो मेरी इकलौती पेंट थी। रोज़ धोकर, सुखाकर, इस्त्री करके पहनी जाती। एक ही पेंट में हम स्कूल ऐसे पहुँचते जैसे राजा बाबू हों। एक दिन जल्दी में गर्म इस्त्री से हाथ जल गया, लेकिन दर्द से ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं पेंट न जल जाए। उस जलन का निशान आज भी है संघर्ष की याद बनकर।

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नारी शक्ति पर कविता: अग्नि-सी आँखें, वज्र-सा संकल्प

भीतर की दुर्गा: एक मौन युद्ध

यह कविता नारी के बाहरी साहस और भीतर की आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है, जहाँ युद्ध बाहर नहीं बल्कि मन के अंधकार से होता है और हर प्रहार आत्मबोध की ओर एक कदम बन जाता है।

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ज्ञान मंदिर में पुण्यसम्राट श्रीमद् विजय जयन्तसेन सूरीश्वरजी के दीक्षा दिवस पर आयोजित गुरु भक्ति कार्यक्रम Image Caption

गुरु कृपा से पावन हुआ ज्ञान मंदिर

पुण्यसम्राट श्रीमद् विजय जयन्तसेन सूरीश्वरजी म.सा. के दीक्षा दिवस पर ज्ञान मंदिर में दिनभर गुरु भक्ति, प्रवचन, तप, जाप और महाआरती के आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए.

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बिछड़ते प्रेमी की यादों में खोई महिला, अधूरे रिश्ते और विरह की भावना को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कविता

“कुछ तो छोड़ते जाते”

कुछ तो छोड़ते जाते” एक भावनात्मक कविता है, जो बिछड़ते रिश्तों की टीस, अधूरे वादों और प्रेम में मिले विरह को संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। हर पंक्ति में यादों, तन्हाई और टूटे विश्वास का दर्द झलकता है। कविता केवल बिछड़ने की पीड़ा नहीं, बल्कि उन अनकहे सवालों की भी अभिव्यक्ति है जो हर अधूरी प्रेम कहानी के साथ हमेशा जीवित रहते हैं।

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रात में दिल को सुरक्षित रखने के लिए सही नींद जरूरी

हृदय विशेषज्ञों के अनुसार रात के समय दिल के दौरे का जोखिम केवल बीमारी पर नहीं, बल्कि सोने की मुद्रा और नींद से जुड़ी आदतों पर भी निर्भर करता है. हाल के अध्ययनों और अनुभवी आईसीयू नर्सों की सलाह के मुताबिक, बाईं करवट हल्के मुड़े घुटनों के साथ सोना दिल पर दबाव कम करता है और रक्त संचार को बेहतर बनाता है. हालांकि, केवल मुद्रा बदलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कुछ अतिरिक्त सावधानियां अपनाना भी जरूरी है.

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वृद्धाश्रम के कमरे में खिड़की के पास बैठी एक वृद्ध माँ, आँखों में आँसू और हाथों में परिवार की पुरानी तस्वीर, बाहर दीपावली की रोशनी और भीतर गहरा अकेलापन।

टूट जाती हूँ जब…

वृद्धाश्रम में रह रही एक माँ के मन की पीड़ा, बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और उपेक्षा के दर्द को अभिव्यक्त करती यह मार्मिक कविता पाठकों को रिश्तों, संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है।

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घनघोर घटा सावन की…

“सावन जब अपने पूरे श्रृंगार में होता है, तब हर डाल झूमती है, हर कोना भीगता है — लेकिन एक बेटी के मन का कोना तब भी सूना रह जाता है जब वह बाबुल के आंगन से दूर होती है। अमराइयों की डालियाँ झूलों से भर जाती हैं, लेकिन उसकी आँखों में झूले पीहर की यादों के बनते हैं। मेघा की हर गर्जना में वह अपनी माँ की पुकार सुनती है, और हर रिमझिम बूँद में अपने बचपन की हँसी। सावन, जो बाकी दुनिया के लिए उल्लास है, एक बेटी के लिए कभी-कभी वेदना की धूप-छाँव भी बन जाता है।”

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