पोहे : स्वाद, परंपरा और देसी दिलों का मिलन

पोहे तो पोहे हैं — एक ऐसा देसी नाश्ता जो न केवल पेट भरता है, बल्कि दिल भी जीत लेता है। खासकर जब बात हो मराठी कांदा-बटाटे पोहे की, तो फिर स्वाद की बात ही कुछ और होती है। राई, कड़ी पत्ता, प्याज, मूंगफली, नींबू और ऊपर से नारियल की सजावट — हर कौर में बस आनंद ही आनंद। चाहे दडपे पोहे हों या मिसळ पोहे, एक्सपेरिमेंट भले होते रहें, पर असली प्रेम तो उसी ऑथेंटिक स्वाद से है। मराठी शादियों में भी पोहे-चाय की रस्म दिलों को जोड़ने का माध्यम बनती है। आज का दिन कुछ देसी हो जाए

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वो शाम…

वो शामें कभी कितनी खूबसूरत हुआ करती थीं समंदर के किनारे आपके कंधे पर सिर टिकाकर डूबते सूरज की लालिमा को निहारना, लहरों में उसका प्रतिबिंब देख थम-सा जाना। समुद्र की जलतरंगें भी तब मानो हमारे प्यार का सुर छेड़ती थीं। आपका हाथ मेरे हाथ में होता, तो लगता था जैसे सारी दुनिया हमारे भीतर सिमट आई हो। बच्चों की मासूम आवाजें, समंदर किनारे की हलचल सब कुछ अपनी जगह था, पर हमारे बीच एक शांत-सी खुशी बहती थी।

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पेड़ के नीचे ध्यान में बैठा व्यक्ति और सामने प्रकाश रूप में प्रकट चेतना, आत्मसंवाद और आंतरिक शांति का प्रतीक

चेतना और मनुष्य का संवाद

यह रचना मनुष्य और उसकी चेतना के बीच एक गहन संवाद को प्रस्तुत करती है, जहाँ आत्ममंथन, मोह, विरक्ति और जीवन के सत्य पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। यह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा है, जो व्यक्ति को स्वयं से साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

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अपने अधूरे सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष करती एक भारतीय महिला का भावनात्मक दृश्य

उसने छोड़े नहीं थे, बस छिपा लिए थे सपने

कुछ लड़कियाँ अपने सपने छोड़ती नहीं, बस वक्त और जिम्मेदारियों के नीचे छिपा देती हैं। यह कहानी एक ऐसी ही लड़की की है, जिसने परिस्थितियों से समझौता किया, लेकिन अपने भीतर की पहचान को कभी मरने नहीं दिया।

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ऑटो चालक पिता के बेटे के कलेक्टर बनने पर भावुक दृश्य, झोपड़ी के सामने भीड़ और गर्व से भरा पिता

अस्तित्व

“अरे काकी, तुम्हें नहीं मालूम क्या? बंसी का बेटा कलेक्टर बन गया है…” संध्या की बात सुनते ही जानकी काकी की आँखों में चमक आ गई। दिन-रात ऑटो चलाकर बेटे को पढ़ाने वाले बंसी की तपस्या आज रंग लाई थी। जब मीडिया ने बेटे से उसकी सफलता का श्रेय पूछा, तो उसने बिना झिझक कहा—“मेरे बाउजी… क्योंकि फल की पहचान हमेशा पेड़ से ही होती है।” यह सुनकर बंसी की आँखों से आँसू बह निकले, और आसपास खड़ी भीड़ तालियों से गूंज उठी। यह सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और प्रेम का प्रमाण है, जो एक पिता अपने बच्चे के लिए जीता है।

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रात के समय महल से जाते बुद्ध, पीछे यशोधरा गोद में राहुल को लिए दुख और धैर्य के साथ खड़ी हैं।

पुनर्जन्म

‘पुनर्जन्म’ एक विचारोत्तेजक कविता है जो बुद्ध के संन्यास और यशोधरा के मौन त्याग के बीच स्त्री जीवन के अनकहे संघर्ष को उजागर करती है। यह कविता समाज की दोहरी मानसिकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ते विद्यार्थी, जो एकता, सहयोग और आत्मविश्वास का प्रतीक हैं।

जब हम साथ होते हैं…

जब लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ते हैं, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यह प्रेरक कहानी आत्मविश्वास, सहयोग और एकता की शक्ति का सुंदर संदेश देती है।

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भीड़भाड़ से दूर शांत वातावरण में स्वयं के भीतर झांकती एक चिंतनशील महिला का भावुक दृश्य।

आज मिली मैं…खुद से !

यह रचना आत्मखोज की उस गहन यात्रा को दर्शाती है, जहाँ इंसान दुनिया की भीड़ से निकलकर अपने भीतर के सत्य, शांति और वास्तविक अस्तित्व से मिल पाता है।

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भीड़

भीड़ के बीच बैठी खून से लथपथ घबराई लड़की को युवक ने अपना कोट ओढ़ाकर उठाया, और तमाशा देखती भीड़ पर गुस्से से गरज उठा.“अगर आपकी बेटी होती, तो भी ऐसे ही खड़े रहते?”

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