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कन्हैया

मैं कन्हैया को ढूँढ रही हूँ। घर, बाहर, देहरी, हर द्वार पर तलाश करती हूँ, पर न जाने किन कुंज-गलियों में वह छिपा हुआ है, मानो आज फिर मटकी फोड़ने आया हो।वह तनिक भी पास नहीं आता। छलिया रोज़ कोई न कोई छल करके निकल जाता है। मैं मथ-मथकर माखन तैयार करती हूँ, पर पता नहीं वह इसे कैसे भोग लगाता है।वह चोर की तरह घर के भीतर आ जाता है, हंडिया से माखन ले जाता है। मैं सोचती हूँ कि उसे कैसे पकड़ूँ, लेकिन वह तो क्षण भर में अदृश्य हो जाता है। अब तो कोई उपाय बताओ। उस माखन चोर को ढूँढकर लाओ। नंद बाबा से जाकर कोई कहो, ताकि मेरे इस व्याकुल हृदय को चैन मिल सके।

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