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शशिकला पटेल को पीएच.डी. की उपाधि

मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा शशिकला पटेल को समावेशी शिक्षा पर किए गए उत्कृष्ट शोध के लिए डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने यह शोध गोखले कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड रिसर्च, परेल में प्रो. (डॉ.) प्रशांत काले के मार्गदर्शन में पूर्ण किया। इस अवसर पर कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति रही, जिन्होंने उनके शोधकार्य में सहयोग और प्रेरणा प्रदान की।

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नागदा में समय पर उपचार ने बचाई 30 वर्षीय युवक की जान

नागदा में चौधरी हॉस्पिटल के डॉ. सुनील चौधरी ने समय पर उपचार कर 30 वर्षीय सनी गोयल की जान बचाई। अचानक आए हार्ट अटैक के बाद डॉक्टर की तत्परता और अनुभवी निर्णय से युवक को नया जीवन मिला। परिजनों ने डॉक्टर की टीम का आभार जताया और लोगों ने सेवाभाव की सराहना की।

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सर्द सुबह में धुंध से घिरा शहर, हल्की धूप, लोग ऊनी कपड़ों में अलाव के पास बैठे हुए

सूरज ओढ़े रजाई

यह कविता शीत ऋतु के सजीव और मानवीय चित्रण को प्रस्तुत करती है, जहाँ सूरज भी रजाई ओढ़े प्रतीत होता है. ठंडी हवाएँ, पहाड़ों की बर्फ, अलाव की गर्माहट, तिल-गुड़ की सोंधी खुशबू और धूप की कोमल मुस्कान मिलकर सर्द मौसम का एक जीवंत, आत्मीय और सौंदर्यपूर्ण दृश्य रचती हैं.

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026 में लो-राइज़ जींस की वापसी: वाई2के फैशन ट्रेंड फिर चर्चा में

लो-राइज़ जींस की वापसी

नाभि दिखाती कमरलाइन, नीचे बैठी जींस और आत्मविश्वास से भरा अंदाज़—साल 2026 में फैशन की दुनिया एक बार फिर 2000 के दशक की ओर लौट चुकी है। लो-राइज़ जींस, जिसे कभी “खतरनाक रूप से नीचे बैठी जींस” कहा जाता था, अब नए रूप, बेहतर फिट और ज्यादा आराम के साथ दोबारा ट्रेंड में है।

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छोटी कहानियों में बड़े अर्थ

रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ समकालीन हिंदी लघुकथा को एक नई चेतस दिशा प्रदान करता है। ये लघुकथाएं केवल आक्रोश, टकराव या विरोध का आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय सहकार, संवेदनात्मक विस्तार और यथार्थ का सधा हुआ समन्वय देखने को मिलता है। संग्रह की रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी आत्मीयता और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। कभी मनोविज्ञान की परतें खुलती हैं, तो कभी समाजशास्त्रीय संदर्भों का मूक आकलन होता है। ‘दुकानदारी’, ‘अन डू’, ‘सम्मान’, ‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथाएं अपनी गहनता और प्रतीकों के माध्यम से पाठक के मन को छू जाती हैं। लेखिका की भाषा-संरचना और कथ्य विन्यास लघुकथा को संवेदना की ऐसी धरती पर स्थापित करते हैं, जहाँ विचार और अनुभूति दोनों का संतुलन है।”

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“हँसी, प्यार और टॉफी”

कविता बच्चों की मासूमियत और उनके प्रिय व्यंजन—टॉफी किस्मी बार—के इर्द-गिर्द घूमती है। यह उनके खुशियों भरे छोटे-छोटे क्षणों को दर्शाती है, जैसे नन्हे-मुन्ने बच्चों का पापा से टॉफी की उम्मीद करना, जन्मदिन पर खुशी और परिवार के साथ बिताए गए प्यारे पल। कविता में न केवल मिठास बल्कि प्यार, दोस्ती और सरल जीवन की खुशियों का जश्न भी है। हर बार “प्यारी टॉफी किस्मी बार” का दोहराव बच्चों की मासूमियत और आनंद को उजागर करता है।

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जब उम्र अपने रंग दिखाती है

चालीस और पचास के बीच की उम्र न तो पूरी तरह जवान रहने देती है और न ही वृद्ध होने की अनुमति। सफेद बाल, मेकअप पर आत्म-हास्य, हील सैंडल में असुविधा और फिल्मों में रुचि की कमी—ये सब संकेत हैं उस उम्र की जटिलताओं और बदलाव की। यह मध्यम आयु में आत्मनिरीक्षण, अनुभव और जीवन की बदलती धाराओं का एक मार्मिक अनुभव है।

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विश्व पुस्तक मेले में उज्जैन की गूंज: ‘व्यंग्य के रंग’ में शामिल डॉ. हरीशकुमार सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘व्यंग्य के रंग’ में उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह की रचना का चयन शहर के लिए गौरव का विषय बना।

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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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महंगाई

आज की महंगाई ने जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया है। हर चीज़ की कीमत बढ़ गई है और आम आदमी का घर चलाना कठिन हो गया है। पहले जो छोटी-सी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं जैसे मोटर या भिंडी . अब उन्हें खरीदना भी मुश्किल हो गया है। तेल न होने पर खाना बनाना भी मुश्किल हो जाता है और परेशानियाँ बढ़ जाती हैं। लोग पूछते हैं तो कुछ कह नहीं पाते, और ना पूछें तो मन में ही दुःख बढ़ता रहता है। महंगाई की मार से जीवन इतना जटिल हो गया है कि इसे अनदेखा करना भी मुश्किल है।

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