दौड़ते-दौड़ते कहीं ज़िंदगी पीछे न छूट जाए
प्रतिस्पर्धा, पैसा कमाने की होड़ और डिजिटल दुनिया ने इंसान को अपनों से दूर कर दिया है. ऐसे में जरूरी है कि हम भागती जिंदगी से थोड़ा वक्त निकालें, रिश्तों को समय दें और तनाव के बजाय सुकून को चुनें.

प्रतिस्पर्धा, पैसा कमाने की होड़ और डिजिटल दुनिया ने इंसान को अपनों से दूर कर दिया है. ऐसे में जरूरी है कि हम भागती जिंदगी से थोड़ा वक्त निकालें, रिश्तों को समय दें और तनाव के बजाय सुकून को चुनें.
हमारे समाज में बराबरी का दावा तो बहुत किया जाता है, मगर हकीकत कुछ और ही है। एक ओर बेटों की चाह में बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है, तो दूसरी ओर दहेज के लिए उन्हें जलाया जाता है। बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाती है, जबकि पीड़िताओं से कठोर सवाल पूछे जाते हैं।
रात के सन्नाटे में एक बुज़ुर्ग पिता भयभीत होकर अपने दिवंगत बेटे को पुकारते हैं। उन्हें दिखाई देता है कि कृत्रिम रोशनी से भ्रमित होकर दुनिया भर के पक्षी उनके कमरे की ओर टूटे चले आ रहे हैं। यह केवल एक सपना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे बढ़ते असंतुलन और प्रकाश प्रदूषण की भयावह चेतावनी है। संवेदनाओं, पर्यावरण और मानवीय रिश्तों को छूती यह कहानी पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।
दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।
प्रेम में स्वयं को खो देना प्रेम नहीं. कृष्ण के संदर्भ में लिखी यह कविता प्रेम, आत्मस्वीकृति और आत्मसम्मान के बीच एक अलग दृष्टि प्रस्तुत करती है.
मेरी क़िस्मत में तेरा साथ अगर हो जाएज़िंदग़ी का मेरा आसान सफ़र हो जाएऔर कुछ भी नहीं ख़्वाहिश मेरी अब इसके सिवामेरे महबूब की बस मुझ पे नज़र हो जाए.
दिल्ली से पटना की बारह घंटे की रेल यात्रा में पनपा किशोर प्रेम समाज और संस्कारों की दीवार से टकराकर दबा दिया जाता है, पर उसका मीठा दर्द शेफाली के जीवन भर उसके साथ रहता है।
उज्जैन। हिंदी पखवाड़े के अवसर पर सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला एवं ललित कला अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी हिंदी भाषा और साहित्य में करियर की नई दिशाएँ विषय पर केंद्रित थी। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि वक्ता नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार…
यह बाल कहानी आरव की गर्मी की छुट्टियों, नानी के गांव और दोस्ती के खजाने की खोज के जरिए बच्चों को यादों, मित्रता और खुशियां बांटने का सुंदर संदेश देती है।
: जहां साइबर ठग अक्सर बुजुर्गों को निशाना बनाकर उन्हें डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते हैं, वहीं निगडी में एक 81 वर्षीय पिता ने अपनी सूझबूझ से ठगों की पूरी साजिश नाकाम कर दी. उनकी सतर्कता से उनके बेटे और बहू को लाखों रुपये की ठगी से बचाया जा सका.