साहित्यिक सम्मान की यात्रा

रांची से पटना तक, सम्मान, स्मृतियाँ और संस्कार

डॉ. उर्मिला सिन्हा

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन, कदमकुआँ, पटना से जब फोन आया
“आपका चयन चतुर्वेदी प्रतिभा मिश्र साहित्य सम्मान हेतु किया गया है”
तो मन में आश्चर्य और प्रसन्नता, दोनों ने एक साथ दस्तक दी।
सम्मान और प्रशंसा भला किसे आह्लादित नहीं करती! मैं तो एक साधारण-सी मानवी हूँ।

सम्मान के साथ यह भी बताया गया कि ठहरने, नाश्ता और भोजन की व्यवस्था सम्मेलन की ओर से होगी, पर आने-जाने का टिकट स्वयं वहन करना होगा। इसके बाद परिवार में मंथन शुरू हुआ. भीषण ठंड, शीतलहर, कोहरा… ऐसे मौसम में रांची से पटना की यात्रा कैसे हो?

मुझसे भी अधिक उत्साहित मेरे बच्चे थे। प्लेन का भरोसा नहीं, बस और ट्रेन कोहरे में अनियमित तभी मेरे आर्य पुत्र संकटमोचक बने- “जब घर में गाड़ी है, ड्राइवर है, तो चिंता कैसी? पहले गाँव चलते हैं, फिर वहीं से पटना।”

किसी तरह तैयारी हुई। रांची की कनकनी के बीच 17 दिसंबर को हम दोनों के साथ इंजीनियरिंग कॉलेज से छुट्टियों में घर आया मेरा बड़ा पोता भी गाँव के लिए निकल पड़ा. जस्ट लाइक पिकनिक।

हमारा दृढ़ विश्वास है कि गाँव में आज भी सभी आधुनिक सुविधाएँ हैं, और यदि बच्चे गाँव नहीं आएँगे तो अपने खेत-पथार, अपनी मिट्टी को कैसे पहचानेंगे? नई पीढ़ी को पैतृक जड़ों से जोड़ना हम बड़ों का दायित्व है।

नौ घंटे की हँसती-खेलती यात्रा के बाद हम अपने पैतृक गाँव पहुँचे। 19 दिसंबर को वहाँ से पटना के लिए प्रस्थान किया। गाँव की ओर से जाड़े का सौगात साथ था नयका चूड़ा, तिलकुट, गुड़, बगान की सब्जियाँ, बैंगन, मूली, कद्दू, कोहड़ा।

रास्ते में दानापुर पोते के नाना-नानी के यहाँ सुस्वादु भोजन का आनंद लिया और फिर पटना मायके का सुख लेने पहुँचे। मायके पहुँचते ही सारी चिंताएँ स्वतः मिट जाती हैं, मन बचपन की गलियों में घूमने लगता है।

20 दिसंबर 2025 को सुबह नौ बजे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में पंजीकरण था। शिक्षक जीवन की आदत समय का सम्मान इस ठंड में भी समय से पहुँची।
मुझे देखते ही आवाजें आईं-
“उर्मिला दी… उर्मिला मैम…”

जो लोग अब तक केवल मेरी लेखनी और तस्वीरों से मुझे जानते थे, उनका टूटकर गले मिलना, फोटो खिंचवाने की होड़ मेरे अंतर्मन को भिगो गया। यह कोई रक्त-संबंध नहीं था, यह शुद्ध साहित्यिक नाता था।

कार्यक्रम का उद्घाटन 11 बजे बिहार के राज्यपाल महामहिम आदरणीय आरिफ मोहम्मद खान जी के करकमलों से हुआ। उनकी विद्वतापूर्ण हिन्दी, संस्कृत श्लोकों का प्रयोग और सारगर्भित वक्तव्य ने सभी साहित्यकारों को अभिभूत कर दिया। नाश्ता, भोजन, चाय, निःशुल्क चिकित्सा जांच सब कुछ अत्यंत सुव्यवस्थित था। निरंतर साहित्यिक गोष्ठियाँ और विशेषज्ञों के संबोधन ने छात्र जीवन की स्मृतियाँ ताजा कर दीं।

21 दिसंबर 2025 को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष आदरणीय श्री अनिल सुलभ जी के हाथों “चतुर्वेदी प्रतिभा मिश्र साहित्य सम्मान” का सम्मान-पत्र प्राप्त कर हृदय कृतज्ञता से भर उठा। इस अवसर पर मैंने अपनी स्वरचित कहानी-संग्रह “एक जोड़ी आँखें” उन्हें सादर भेंट किया। कवि गोष्ठी का आनंद लिया।

इसके बाद पितृतुल्य छोटका भइया से आशीर्वाद लिया। वे भावुक होकर बोले-“आज हमारे माता-पिता, भइया-भाभी और तुम्हारे सास-ससुर, जेठ-जिठानी जीवित होते तो कितना खुश होते।” मेरी पलकें भीग आईं।

परिजनों से मिलना, भोजन, गपशप सबके बाद शाम सात बजे ढाई घंटे की निजी कार यात्रा कर पुनः अपने गाँव लौट आई। यहाँ अलाव जलाकर ठंड भगाने का जद्दोजहद जारी है। चारों ओर कुहासा, टप-टप गिरते जलकण, सूर्यदेव के दर्शन दुर्लभफिर भी अपनापन, प्यार और स्नेह हर ओर बिखरा है।

साल 2025 के अंतिम दिनों में यह सम्मान-पत्र पाकर
भूल गए सारे गिले-शिकवे,
ईश्वर-वंदना में झुक गया शीश,
और अपनों की शुभकामनाओं ने
जीवन को फिर से उजास से भर दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *