एक साल के बच्चे ने खेल-खेल में कोबरा को काटा
बिहार के बेतिया में एक साल के मासूम ने खेल-खेल में कोबरा को काट डाला। सांप की मौत हो गई, लेकिन बच्चा सुरक्षित है और इलाज के बाद खतरे से बाहर बताया जा रहा है।
लव यू….टेक केयर
शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।”
200 साल पहले एक भारतीय ने दुनिया को दिया ‘शैम्पू’ शब्द
आज बाथरूम में रखी शैम्पू की बोतल एक आम चीज़ है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द और इसकी शुरुआत के पीछे एक भारतीय का हाथ है? 19वीं सदी में पटना के रहने वाले साके डीन महोमद ने न सिर्फ ब्रिटेन में भारतीय मसाज थेरेपी को लोकप्रिय बनाया, बल्कि अंग्रेजी भाषा को ‘शैम्पू’ जैसा शब्द भी दिया।
डॉ. संजुला सिंह को मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान
जमशेदपुर की वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार डॉ. संजुला सिंह “संजू” को नेपाल की संस्था द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा सम्मान रत्न 2026 से सम्मानित किया गया। महिला दिवस के अवसर पर उन्हें साहित्य और मातृभाषा के संवर्धन में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया।
यूँ ही तो नहीं
कुछ मुलाकातें सिर्फ इत्तेफ़ाक़ नहीं होतीं, वे किस्मत की लिखी कहानी होती हैं। “यूँ ही तो नहीं” एक ऐसी ही ग़ज़ल है, जो इश्क़ और तक़दीर के अनोखे रिश्ते को उजागर करती है।
ऐ अजनबी सांवरे
यह कविता प्रेम, पहचान और आत्मिक संवाद की कोमल अभिव्यक्ति है। ‘अजनबी’ और ‘सांवरे’ के प्रतीकों के माध्यम से कवि मन की उस यात्रा को शब्द देता है, जहाँ नादानी, तलाश और समर्पण एक-दूसरे में घुल जाते हैं। प्रेम यहाँ केवल सांसारिक नहीं, बल्कि भक्ति और आत्मा का स्वर बन जाता है। मन की भटकन, चित की चोरी और ऋतु प्रीत की सुगंध के साथ यह रचना पाठक को भीतर तक छूती है और उसे अपने ही भावलोक में ले जाती है।
मसूरी में हनीमून के दौरान 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर महिला की संदिग्ध मौत
मसूरी के एक होमस्टे में हनीमून पर गई 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर पी. राधा गायत्री की संदिग्ध मौत. कमरे से खून के निशान, शराब की बोतलें बरामद, पुलिस जांच जारी.
काली राख की बस्ती
कभी-कभी कोई दर्दनाक घटना सुनने भर से ही दिल काँप जाता है। पर जब ऐसा पता चलता है कि वह दर्द किसी ऐसे इंसान के साथ हुआ है जिसे हम रोज़ देखते थे, जिसके बच्चे हमारे सामने खेलते थे,
बचपन
बचपन के वे सुनहरे दिन छोटी-छोटी खुशियों से भरे थे काग़ज़ की कश्तियाँ, बरसात की लहरें और मासूम शरारतें। पर समय बदल गया; तकनीक और प्रतिस्पर्धा ने सरल मनों पर बोझ डाल दिया। जहाँ बच्चों को खुलकर उड़ना चाहिए था, वहीं आज उनके आस-पास चिंता, दबाव और अनचाही समझदारी के पहरे खड़े हैं। फिर भी आशा यही है कि बचपन अपने स्वच्छंद पंखों से उड़ान भरे और माता-पिता का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे।
