जहाँ कभी नागिन डांस गूँजता था… अब बस DJ का शोर है

सुनील परिहार, लेखक एवं सोशल वर्कर, महिदपुर रोड
कभी शादियों में ऐसा माहौल होता था कि बिना सोचे-समझे कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते थे. ढोल की आवाज़ दूर से आती थी और मन पहले ही नाच उठता था. सिर्फ नागिन का डांस ही नहीं.. झूम बराबर.. झूम शराबी… ये देश है वीर जवानों का… जैसे गीत बजते ही लोग एक आनंद में मिलकर झूम जाते थे.. झूम बराबर..झूम शराबी… में कोल्ड ड्रिंक या सिर्फ पानी की बोतल हाथ में लेकर डांस किया जाता था… लेकिन अब नकली नहीं असली शराब चलती है बकायदा.. एक कार में पूरी व्यवस्था होती है.. दूल्हे के पीछे जनरेटर वाले के बाद.. वही बारात में नाचने वालों को उर्जा प्रदान करता है.. इसके लिए दुल्हे को अपने दोस्तों के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है… क्या करें भाई जमाना बदल रहा है.
एक और राजस्थानी गीत जिस पर महिला पुरुष बराबरी से अपना योगदान देते थे.. पल्लो लटके म्हारो पल्लो लटके… महिलाएं तो इस पर हाथ आजमाती ही थी.. पुरूष भी कम नही होते थे.. वे भी रुमाल को सिर पर डालकर घूंघट बना कर मस्ती में डांस किया करते थे… अब सब कुछ बदल रहा है… बदल रहा नहीं बदल ही गया है.
नागिन डांस का तरीका भी एकदम अलग था.. इसमें दो व्यक्ति शामिल होते थे.. एक रुमाल से बीन बजाने का अभिनय करते हुए डांस करता था. दूसरा नागिन बन कर…हद तो तब हो जाती थी.. जब नागिन और सपेरे का रोल करने वाले अपने नए कपड़ों की परवाह नहीं करते हुए जमीन पर लौट जाते थे…. यह होती थी.. दुल्हे की शादी में पूरी तरह से इन्वाल्व हो जाने की इच्छा.. उस नाच में एक सादगी थी एक अपनापन था एक खुशी थी जो खरीदी नहीं जाती थी. बस जी जाती थी.आज वह धुन नहीं सुनाई देती.और न जाने क्यों, दिल में एक हल्की-सी कसक उठ जाती है.
शोर बढ़ा, संगीत मर गया
अब शादी के नाम पर बेतहाशा शोर है. की इतनी तेज़ ध्वनि कि न बोल सुनाई देते हैं न दिल की धड़कनें महसूस होती हैं. पहले जहाँ हर बीट में ताल होती थी, अब हर बीट में बेचैनी है.ढोल की धमक जो छाती में उतरती थी, अब का शोर सिर पर हथौड़े की तरह गिरता है.
लोग कहते हैं. ़फैशन है! लेकिन जाने क्यों उस ़फैशन में खुशियों का स्वाद नहीं है. पहले शादियाँ रिश्तों का मेला होती थीं.हँसी, ठहाके, चुहल, आशीर्वादसब कुछ खुलकर, बेशर्त. बल्ले बल्ले पर नाचते हुए अनजान लोग भी अपने लगने लगते थे.अब सब सजधज के आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, और चले जाते हैं. न कोई दिल खोलकर नाचता है, न कोई बेफिक्र हँसता है. मानो हर कोई अपने ही भीतर कैद होकर रह गया हो.
शादी नहीं, फोटोशूट की परेड
सबसे ज़्यादा दर्द देता है दूल्हा-दुल्हन का बदलता व्यवहार.जहाँ उन्हें सबका सम्मान करना चाहिए, वहीं वे घंटों परिवारों को इंतज़ार करवाते रहते हैं कभी पार्लर में, कभी स्टूडियो लाइट्स के नीचे,
कभी उसी एक पोज़ में जो ट्रेंडिंग है. कभी-कभी सच में लगता है. क्या ये शादी है या किसी फिल्म का सेट?.दुल्हन का घूँघट पहले मुस्कानों के लिए उठता था, अब कैमरे के लिए.दूल्हा परिवार से गले मिलते हुए मुस्कुराता था, अब फोटो फ्रेम में फिट होते हुए.
काश..यह बदलना स़िर्फ कपड़ों और सजावट तक होता. पर यह बदलना दिलों में उतर गया है.रंगत फीकी इसलिए नहीं कि समय बदल गया, रंगत फीकी इसलिए है कि भावनाएँ पीछे छूट गईं. अब शादियों में सब कुछ है. चमक, शोर, खर्च, सजावट..बस वह दुनिया नहीं है जहाँ रिश्ते गर्माहट से बंधते थे.यह सब देखकर कहीं गहराई में एक थकान जमा होती है.
लगता है. कहाँ गई वे दिल वाली शादियाँ?लेकिन उम्मीद अभी बाकी है.दुनिया गोल हैऔर रिवाज़ भी.बहुत जल्द लोग इस दिखावे से बोर हो जाएँगे.बहुत जल्द दिल कहेगाबस, अब असली खुशी चाहिए.और तब लोग फिर से लौटेंगे..सात्विकता, सादगी, दिल से किए गए नाच-गाने, प्रेम और सम्मान की ओर क्योंकि मन को जो सुख धरती से मिलता है,वह आसमान की रोशनी देने वाला भी नहीं दे सकता.
और शायद फिर किसी दूर की बारात में से एक दिन अचानक वह पुरानी, प्यारी नागिन वाली धुन सुनाई दे.
और दिल कह उठे.. तन डोले मेरा मन डोले…

परिवर्तन ही प्रकृति नियम है… सुंदर विचार ✍️👌👌
सत्य,
अब भाव नहीं जाहिर करते
अब भाव(कीमत) जाहिर करते
बहुत धन्यवाद
भूली बिसरी एक कहानी फिर आई याद पुरानी हमारे कई मित्रों को नागिन डांस पर महारात हासिल थी
बहुत बहुत धन्यवाद भाई साहेब
आधुनिकता ने संस्कृति का स्वरूप बदल कर रख दिया
अब तो केवल दिखावा एवं पैसा तथा मतलब की भावना रह गई है दिल का भाव लुप्त होता जा रहा है
राजेंद्रजी, आपकी टिप्पणियों की हमेशा प्रतीक्षा रहेगी. ऐसी ही टिप्पणी कर हमारा मार्गदर्शन करें.