वह बहक गई थी…
क्या केवल अच्छा इंसान होना ही महानता की पहली शर्त है? यह कविता आधुनिक युग में महानता, संवेदनशीलता, अतिवाद और मानसिक संघर्ष के जटिल संबंधों पर गहन प्रश्न उठाती है।

क्या केवल अच्छा इंसान होना ही महानता की पहली शर्त है? यह कविता आधुनिक युग में महानता, संवेदनशीलता, अतिवाद और मानसिक संघर्ष के जटिल संबंधों पर गहन प्रश्न उठाती है।
वृद्धाश्रम में रह रही एक माँ के मन की पीड़ा, बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और उपेक्षा के दर्द को अभिव्यक्त करती यह मार्मिक कविता पाठकों को रिश्तों, संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है।
अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।
हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।
मेरी क़िस्मत में तेरा साथ अगर हो जाएज़िंदग़ी का मेरा आसान सफ़र हो जाएऔर कुछ भी नहीं ख़्वाहिश मेरी अब इसके सिवामेरे महबूब की बस मुझ पे नज़र हो जाए.
डॉ प्रेरणा मनाना, पूर्व निदेशक आरडी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, लेखिका स्तंभकार इंदौर- भारतीय संत परंपरा के महानतम व्यक्तित्वों में से एक, संत महामंडलेश्वर अभिराम दास जी त्यागी, बुधवार को हमारे निवास स्थान पधारे। उनके आगमन से पूरा वातावरण दिव्यता, शांतिपूर्ण ऊर्जा और सकारात्मकता से भर गया। संत श्री अभिराम दास जी त्यागी न केवल एक…
मौसमी चन्द्रा एक बहुमुखी हिंदी लेखिका और संपादिका हैं, जिनकी रचनाएँ भावनात्मक गहराई और सामाजिक सरोकारों से परिपूर्ण हैं।
तुम मेरे जीवन का वह विश्वास हो, जो अँधेरों में भी राह दिखाता है। जब संसार डगमगाता है, तब तुम्हारी मौजूदगी मुझे स्थिर रखती है। यह साथ किसी वचन या शपथ से बड़ा है. यह आत्मा की स्वीकृति है, जहाँ भय का कोई स्थान नहीं। तुम्हारे इश्क़ में मुझे सुकून मिला है, ऐसा सुकून जो प्रश्न नहीं करता, केवल स्वीकार करता है। हम दो शरीर नहीं, एक ही चेतना के विस्तार हैं तुम मेरी साधना हो और मैं तुम्हारी आस्था। इसी निष्कपट प्रेम में जीवन की हर कठिनाई सहज हो जाती है, और हर पथ आलोकित।
यह कविता एक ऐसे टूटे हुए मन की आवाज़ है, जिसने अपने पूरे संसार को एक ही व्यक्ति में समेट लिया था. भरोसे, प्रेम और समर्पण के बदले उसे झूठ, छल और दर्द मिला. यह रचना विश्वास के टूटने से उपजे आंतरिक संघर्ष, पीड़ा और आत्मबोध को बेहद मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है