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बदलता वक़्त कविता में दर्शाई गई समाज की पीड़ा और इंसानियत का क्षरण

बदलता वक़्त…

“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।

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कलियुग

कहते हैं कि कलियुग आ चुका है, लेकिन अब लगता है कि वह चारों दिशाओं में फैलकर मनुष्य के भीतर गहराई तक उतर चुका है। रिश्तों में विष घुल गया है भाई भाई का नहीं रहा, माँ घर की देहरी से बाहर धकेल दी गई, और धन ही सम्मान का नया मापदंड बन गया। समाज में भय, हिंसा, लोभ और छल ऐसी सहजता से घुलमिल गए हैं कि कोई उन्हें असामान्य भी नहीं मानता। प्रकृति भी जैसे मनुष्यों के पापों की साक्षी बनकर अपना क्रोध दिखा रही है नदियाँ मार्ग बदल रही हैं, वर्षा अनियंत्रित हो रही है और जीवन असुरक्षा में डूबता जा रहा है।

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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Street food vendor cooking on stove with limited gas cylinder amid LPG crisis in India

एलपीजी संकट : रेस्टोरेंट मेन्यू से गायब हो रहे व्यंजन

भारत में बढ़ती एलपीजी कमी का असर अब रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड व्यवसाय पर साफ दिखाई दे रहा है। गैस की कमी के कारण कई शहरों में रेस्टोरेंट अपने मेन्यू से डोसा, रोटी, भटूरा और धीमी आंच पर बनने वाले व्यंजन हटाने लगे हैं।

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महिदपुर रोड में चातुर्मास के दौरान सिद्धि तप करते 52 जैन तपस्वी

52 तपस्वियों की साधना से महिदपुर रोड में गूंजा तप का संदेश: धर्म और तपस्या का बना विशेष वातावरण

महिदपुर रोड में चातुर्मास के दौरान 52 तपस्वी सिद्धि तप की आराधना कर रहे हैं। जानिए सिद्धि तप क्या है, इसकी प्रक्रिया और जैन धर्म में इसके आध्यात्मिक महत्व को।

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खिड़की के पास खड़ा एक व्यक्ति, आंखों में आंसू और दूर किसी की याद में डूबा हुआ भावनात्मक दृश्य

रूबरू एहसास

एक अरसा बीत गया उससे मिले हुए, लेकिन वह हर पल, हर सांस में किसी अनकही बातचीत की तरह मौजूद रहा। उसकी उपस्थिति इतनी गहरी थी कि शब्दों को रोकने की कोशिश के बावजूद, आँखें सब कुछ कह गईं। जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क भी जैसे धुंधला पड़ गया जो खो गया, वही भीतर कहीं जीवित हो उठा।

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साहित्यिक सम्मान की यात्रा

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना में चतुर्वेदी प्रतिभा मिश्र साहित्य सम्मान प्राप्त करना मेरे लिए केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि रांची से पटना तक की वह भावनात्मक यात्रा थी जिसमें परिवार, गाँव, मायका और साहित्यिक रिश्तों का आत्मीय संगम साकार हुआ। यह सम्मान वर्ष 2025 के अंत में जीवन को कृतज्ञता और आनंद से भर देने वाला क्षण बन गया।

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पास होकर भी दूर: दो दिलों की ख़ामोश मोहब्बत

“कुछ रिश्ते होते हैं, जो बिना नाम के भी ज़िंदा रहते हैं। न वे समाज से मान्यता चाहते हैं, न किसी वादे की ज़रूरत होती है। बस एक मौन जुड़ाव होता है—जिसमें न कोई अधिकार होता है, न अपेक्षा। चितरा और सत्य का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था—जहां भावनाएं थीं, गहराई थी, पर कोई दावा नहीं था। यह प्यार था, लेकिन ऐसा प्यार जो छूने से पहले ही समझ जाता है, जो मिलने से पहले ही विदा ले लेता है। एक ऐसा रिश्ता जिसे शब्द नहीं बाँध सकते, पर आत्मा पहचान लेती है।”

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कमियाँ हर इंसान में होती हैं, लेकिन बदनाम सिर्फ चाँद होता है. यह कविता चाँद की खूबसूरती, उसकी चाँदनी और इंसानी सोच की गहराई को बेहद भावुक अंदाज़ में प्रस्तुत करती है.

चांद में दाग

चाँद में दाग़ जरूर होता है, लेकिन मानव भी कभी पूर्ण नहीं होता। कमियाँ सभी में होती हैं, फिर भी केवल चाँद ही बदनाम माना जाता है। उसकी खूबसूरती, गुण और चाँदनी की रौशनी, अंधेरे को काट देने की क्षमता, पूर्णमासी की छटा—सब कुछ अद्भुत है। अमावस की रात को उसकी कमी महसूस होती है, लेकिन आसमान में उसकी सुंदरता और प्यारा प्रभाव सबको भाता है। अक्सर लोग केवल दोष देखते हैं, जबकि अगर हम अपने गिरेबान में झाँकें, तो पता चलता है कि हमारी खुद की कमियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं।

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