तेरे आँगन का उजियारा…
यह कविता प्रेम की उस कोमल अनुभूति को व्यक्त करती है, जहाँ प्रिय का सौंदर्य प्रकृति के हर रूप में झलकता है। कभी वह सूरज की उजास बनकर सामने आता है, तो कभी झरने की मधुर ध्वनि सा मन को स्पर्श करता है।

यह कविता प्रेम की उस कोमल अनुभूति को व्यक्त करती है, जहाँ प्रिय का सौंदर्य प्रकृति के हर रूप में झलकता है। कभी वह सूरज की उजास बनकर सामने आता है, तो कभी झरने की मधुर ध्वनि सा मन को स्पर्श करता है।
जब देवी कामाख्या होती हैं रजस्वला : कामाख्या मंदिर की अनोखी परंपरा रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) भारत की सांस्कृतिक विविधता में अनेक ऐसे पर्व और मेले हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करते हैं। असम के गुवाहाटी स्थित पवित्र कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला ऐसा…
यह कविता बेटियों के प्रति समाज में मौजूद भेदभाव और उपेक्षा की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। नागफनी के प्रतीक के माध्यम से दिखाया गया है कि प्रेम और स्वीकार्यता से वंचित लड़कियां भीतर से कोमल होते हुए भी परिस्थितियों के कारण कठोर बन जाती हैं।
“हाँ मैं श्रमिक हूँ” एक प्रेरक और संवेदनशील हिंदी कविता है, जो मजदूर वर्ग के संघर्ष, परिश्रम और त्याग को उजागर करती है। कविता बताती है कि श्रमिक अपने परिवार से दूर रहकर कठिन मेहनत करता है, लेकिन फिर भी अपने काम में गर्व महसूस करता है। छुट्टियाँ, आराम और उत्सव उसके जीवन में कम होते हैं, फिर भी वह समाज की रफ्तार चलाता है। यह कविता मेहनतकश लोगों के जीवन की सच्चाई को सरल शब्दों में सामने लाती है और श्रमिकों के प्रति सम्मान जगाती है।
एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।
क़तर में अकेली ज़िंदगी जी रही मान्या परिवार की जिम्मेदारियों के बीच खुद को भूल चुकी थी। तन्हाई, पुराने प्रेम की स्मृतियाँ और नए रिश्ते के डर के बीच जब जीवन ने उसे प्रेम का दूसरा अवसर दिया, तब उसे समझ आया कि चलते रहने का नाम ही ज़िंदगी है।
“रीता ने दरवाज़े की दोनों कुंडियाँ कसकर बंद कर दीं।आज उसने ठान लिया था—सच जानकर ही रहेगी। आधी रात को जब उसकी आँख खुली,
तो उसने घबराकर शेफाली के बिस्तर की ओर देखा…बिस्तर फिर से खाली था।रीता की सांसें थम-सी गईं दरवाज़ा तो अंदर से बंद था…तो आखिर शेफाली गई कहाँ?”
बंगाल की चुनावी रैली एक व्यंग्यात्मक कविता है, जिसमें चुनावी नारों, राजनीतिक टकराव, जनभावनाओं और बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रोचक एवं मंचीय अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।