संत महामंडलेश्वर अभिराम दास जी त्यागी का दिव्य आगमन

डॉ प्रेरणा मनाना, पूर्व निदेशक आरडी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, लेखिका स्तंभकार इंदौर- भारतीय संत परंपरा के महानतम व्यक्तित्वों में से एक, संत महामंडलेश्वर अभिराम दास जी त्यागी, बुधवार को हमारे निवास स्थान पधारे। उनके आगमन से पूरा वातावरण दिव्यता, शांतिपूर्ण ऊर्जा और सकारात्मकता से भर गया। संत श्री अभिराम दास जी त्यागी न केवल एक…

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बिना आत्मा के शरीर बेजान

मनुष्य पूरे जीवन उस चीज़ के पीछे भागता रहता है जिसे वह मृत्यु के बाद साथ ले ही नहीं जा सकता। न शरीर उसके साथ जाता है और न ही शौहरत साथ जाता है तो केवल कर्म, जिसकी ओर वह सबसे कम ध्यान देता है। आज अधिकांश लोग अपने सुख के लिए दूसरों के अरमान कुचलने में भी हिचकते नहीं, यही विकर्म उन्हें भीतर से अशांत कर देता है। सच यह है कि बिना आत्मा के शरीर सिर्फ एक बेजान ढांचा है, और बिना शरीर के आत्मा कर्म नहीं कर सकती। शव तभी शव कहलाता है जब आत्मा देह से विदा हो चुकी हो।

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•••प्रेमानंदजी ने लुटाए आंसुओं के मोती

राधारानी के परम भक्त-वृंदावन वाले संत प्रेमानंद जी के प्रवचनों के दीवाने तो पूरे विश्व में हैं। वृंदावन स्थित प्रेमानंद महाराज के आश्रम में उनके दर्शन की एक झलक पाने को ब्रह्म मुहूर्त से हजारों श्रद्धालु जुट जाते हैं। ऐसे माहौल में खुद प्रेमानंद जी इंदौर के श्रद्धालु अतुल तिवारी परिवार को मिलने का समय दिया, उनकी मंत्रमय शंख ध्वनि को एकांत में सुना और सुनते-सुनते भाव विह्वल हो गए।

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विश्वभर में मनाया गया इंटरनेशनल मीटलेस डे

साधु वासवानी की 146वीं जयंती पर करुणा और शाकाहारी संदेश का उत्सव पुणे से सुरेश परिहार की रिपोर्ट करुणा, शांति और शाकाहारी जीवनशैली के संदेश को समर्पित इंटरनेशनल मीटलेस डे इस वर्ष भी वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर मनाया गया। गुरुदेव साधु टी. एल. वासवानी की 146वीं जयंती के अवसर पर दुनियाभर में आध्यात्मिक…

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असली दीवाली: दिखावे नहीं, परिवार की खुशहाली में

डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड) दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए……

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तेरे हवाले है सब

प्रभु, तू ही वह शक्ति है जिसने जीवन के खेल रचे। सब कुछ तेरे हवाले है — चाहे कैसे भी हो, मैं जानता हूँ कि सब तेरी योजना के तहत है।
जब भी दिल से तुझे पुकारा, तूने आवाज़ सुनी और हर मुश्किल में मुझे संभाला। तेरे दम से ही हमारे मंदिर खड़े हैं, शिवालयों की शान बनी है।
तू खुशियों के साथ दुख भी देता है, पर वही जीवन में अंधेरे में उजाले भी बन जाता है। भटकते राहों पर तूने रास्ता दिखाया, और जब हम बिखरे, तूने ही हमें फिर से जोड़कर संभाला।

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“कोमल नहीं, मजबूत है कलाई”

स्त्री केवल कोमल नहीं, बल्कि परिवार और समाज की धुरी है। संस्कार, व्रत, उपवास और साधना के माध्यम से वह न केवल अपने भीतर शक्ति और संयम विकसित करती है, बल्कि पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधती है। यह कविता स्त्री की आंतरिक ऊर्जा, परंपरा और सशक्तिकरण को उजागर करती है।

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ईश्वर पर विश्वास

संपूर्ण हृदय से प्रभु पर भरोसा रखें और अपनी बुद्धि पर निर्भर न रहें। जीवन में चाहे सुख हो या दुख, भय और चिंता को त्यागकर ईश्वर की इच्छा में चलना ही सच्चा विश्वास है। प्रार्थना और समर्पण के माध्यम से हम आंतरिक शांति, स्थिरता और संतोष प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर पर भरोसा केवल आध्यात्मिक अनुभव नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक शक्ति भी देता है। जब हम अपनी चिंताओं को प्रार्थना में छोड़ देते हैं, तब हमारा बोझ हल्का होता है और हम जानते हैं कि हम अकेले नहीं हैं।

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सुहाग पर्व करवा चौथ

यह कविता भारतीय विवाहिता की भावनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है। माता-पिता से विदा होकर नए घर में प्रवेश, पति के प्रति समर्पण और सुहागन होने का गौरव इसमें प्रमुख हैं। सोलह श्रृंगार, लाल चुनरी, मांग टीका, मेहंदी, पायल, चूड़ियाँ और मंगलसूत्र जैसे आभूषण उसकी पारंपरिक सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान को उजागर करते हैं। कविता में करवाचौथ व्रत और चौथ माता से अखंड सुहाग की कामना का भी उल्लेख है। यह अंश स्त्री के नए गृह जीवन, आशाओं और प्रेम भरे संबंधों की महत्ता को भावपूर्ण रूप से व्यक्त करता है।

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रूठे पिया

करवा चौथ की तैयारियों के बीच मन में अजीब सी उदासी थी। रवि की नाराज़गी ने त्योहार की सारी चमक जैसे बुझा दी थी। मैंने उनकी पसंद का खाना बनाकर उसमें “सॉरी” का कार्ड छुपा दिया, उम्मीद थी कि वे मुस्कुराएँगे, कॉल करेंगे — पर सन्नाटा ही जवाब बना रहा। शाम ढली तो आँसू ढलक पड़े। तभी दरवाज़े की घंटी बजी — सामने रवि थे, मुस्कराते हुए। बिना कुछ कहे उन्होंने मुझे बाँहों में भर लिया।

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