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खण्डहरों में घर बसाना ही तो ज़िंदगी है….

ज़िंदगी सिर्फ आसान रास्तों का नाम नहीं है। असली ज़िंदगी तो तब शुरू होती है जब इंसान खंडहरों में भी एक घर बसाने का हौसला रखता है। जब आंसुओं के बीच भी मुस्कुराना न छोड़े, और जब नामुमकिन लगने वाले हालातों को मुमकिन बना देने का साहस दिखाए। मौसम बदलते रहेंगे, कभी उजाले होंगे तो कभी शामें भी उतरेंगी। लेकिन जो इंसान मुश्किलों से डरे नहीं, उन्हें अपना गुरु माने, वही बुलंदियों को छू पाता है। अंधेरे आते हैं, अमावस भी होती है, पर उसी के बीच से चांदनी भी निकलती है — जो इस सच्चाई को समझ ले, वही सच्चे अर्थों में जीना जानता है।

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इजाज़त दो… बस पास रहने की

मैं सोचती हूं कि क्यों इन दिनों हर पल तुम्हारा ही ख़याल आता है। दिल करता है कि कुछ ऐसा बन जाऊं जिससे तुम्हारे आस-पास रह सकूं हमेशा — कभी वो कागज़ जिस पर तुम दिल की बातें लिखते हो, कभी तुम्हारी कलम, तुम्हारी ऐनक, या बस कोई ख़याल जिसमें तुम डूबे रहते हो। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल चाहता है कि मैं वो अश्क बन जाऊं — जो तुम्हारी आंखों में ठहरा होता है, जिसे तुम दुनिया से छुपाकर रखते हो, गिरने नहीं देते किसी के सामने। वही अश्क, जो तुम्हारे सबसे पास होता है और फिर भी नज़र नहीं आता। ख़्वाहिश बस इतनी है… कहो, क्या इजाज़त है?

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श्याम रंग में भीग चला मन

इस कविता में रचनाकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और आध्यात्मिक लगाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। वह पाठक को कृष्ण के धाम की ओर जाने का निमंत्रण देता है — उस पावन भूमि की ओर, जहाँ संध्या होते ही गोपियाँ नृत्य करती हैं और हर दिशा भक्ति-रस में भीग जाती है। श्रीकृष्ण की एक झलक पाकर ऐसा अनुभव होता है मानो मृत्यु भी अब भयावह नहीं, बल्कि सुखद और शांति देने वाली हो गई हो। यह भाव उस आत्मिक स्थिति का संकेत है जहाँ ईश्वर-दर्शन के बाद जीवन-मरण का बंधन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। रचनाकार के लिए कृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य के प्रतीक हैं। उनके भीतर एक ईश्वरीय आभा और तेज है, जो उन्हें औरों से अलग बनाता है, यहाँ तक कि राम से भी। यह तुलना विरोध नहीं, बल्कि भावों की भिन्नता को दर्शाती है — राम मर्यादा के प्रतिनिधि हैं, तो कृष्ण प्रेम के।

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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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प्रयागराज-सा संगम मन

कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कही नहीं जातीं, लेकिन दिल की गहराइयों में अनवरत बहती रहती हैं — सिसकती हुई, दबी हुई, फिर भी महसूस होती हुई। ये धड़कनों में छिपे वो एहसास हैं जो न पूरी तरह अव्यक्त हैं, न पूरी तरह अभिव्यक्त। दिल मानो एक ऐसा प्रयाग है जहाँ हर भावना, हर याद, हर संबंध एकत्र हो जाता है — जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम।हाल ही में जन्मे एक मासूम से इश्क़ ने मन को कुंभ की तरह भीगो दिया है — वह भी मौन में, तप में, जल में और हवा के हर स्पर्श में। तेरी उपस्थिति जैसे हर तत्व में घुल गई है। इस भावनात्मक संगम में अब प्रेम और भक्ति एकसाथ बह रहे हैं। मन जैसे प्रयागराज बनकर इंद्रियों में शंखनाद कर रहा है — बुला रहा है, कि अब इस प्रवाह में तुम भी आ जाओ।

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जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

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धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

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तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

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मासूम मुस्कान और गहरे रहस्यमयी नयनों वाली साधारण भारतीय युवती

कसक

यह कविता एक ऐसी साधारण लेकिन रहस्यमयी स्त्री के सौंदर्य और भावनाओं का चित्रण करती है, जिसकी मासूम मुस्कान और गहरे नयन किसी वेद की तरह गूढ़ प्रतीत होते हैं। बिना श्रृंगार की सादगी, उसके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाती है। हर पंक्ति में प्रेम, रहस्य और भावनाओं की गहराई झलकती है।

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बहुचर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड पर अब फिल्म बनेगी

इंदौर के बहुचर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड पर अब फिल्म बनने जा रही है। फिल्म का नाम फिलहाल ‘हनीमून इन शिलॉन्ग’ रखा गया है, जिसका निर्देशन करेंगे एस.पी. निंबावत। मंगलवार को वे इंदौर पहुंचे और राजा रघुवंशी के परिजनों से मुलाकात कर अधिकारिक अनुमति ली।

परिवार को उम्मीद है कि इस फिल्म के ज़रिए मेघालय की बिगड़ी हुई छवि सुधरेगी। फिल्म की 80% शूटिंग इंदौर में और 20% शूटिंग शिलॉन्ग में की जाएगी।

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