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बचपन को बाँहों में भर लो…

बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.

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खामोश चीख और मां का विश्वास

शुरू शुरू में मुझे विवेक सर से बहुत डर लगता था लेकिन धीरे-धीरे मुझे उनके स्पर्श की आदत हो गई और मैं उनके साथ सहज होने लगी थी, मुझे नहीं पता कि वह स्पर्श मुझे अच्छा लगता था या बुरा लगता था ? मां को बताना चाहती थी पर डरती थी , सोचती थी मां पापा मेरे बारे में क्या सोचेंगे ….. क्या विवेक सर मुझे प्यार करते हैं ? …… कैसा प्यार है यह ?

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महिदपुर रोड ने खोई अपनी ‘विमला भाभी’

महिदपुर रोड के पुराने पीपल के पास रहने वाली मशहूर पारंपरिक दाई ‘ विमला भाभी’ का निधन हो गया. विमला भाभी स्वर्गीय मांगीलाल जी चौहान की धर्मपत्नी, कैलाशचंद्र चौहान, स्व.रमेशचंद्र चौहान की भाभीजी तथा लोकेंद्र, नरेंद्र, स्वर्गीय मनोज की माताजी तथा अंकित की दादी जी विमला बाई चौहान का निधन शनिवार शाम को हो गया.

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दिल-ओ-दिमाग़

कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।

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“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

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बेटियाँ

बेटियाँ घर की रौनक होती हैं चहकती, खिलखिलाती, और दिलों को जोड़ने वाली। बचपन से समझदार बनने तक, और विदाई के क्षण तक, वे अपनी यादें, प्यार और भावनाएँ एक संदुकची में समेटे चली जाती हैं।

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किस्मत का खेल

अपने माता-पिता को आग में खोने के बाद अरुण बिल्कुल अकेला रह गया। एक साड़ी की दुकान में काम करते हुए उसने चोरी रोककर अपने मालिक का विश्वास जीत लिया। मालिक ने उसकी ईमानदारी देखकर उसे अपनी बेटी निशा के साथ विवाह के लिए कहा। किस्मत से उजड़ा अरुण का घर फिर से बस गया, और तीनों एक खुशहाल परिवार बन गए।

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क्या बुज़ुर्ग सच में अकेले पड़ रहे हैं?

84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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भीड़

भीड़ के बीच बैठी खून से लथपथ घबराई लड़की को युवक ने अपना कोट ओढ़ाकर उठाया, और तमाशा देखती भीड़ पर गुस्से से गरज उठा.“अगर आपकी बेटी होती, तो भी ऐसे ही खड़े रहते?”

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