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जालंधर में बाढ़ का संकट गहराया, कई ट्रेनें रद्द और डायवर्ट

पंजाब में लगातार हो रही भारी बारिश ने हालात गंभीर बना दिए हैं. नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है और कई ज़िले बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं. अब जालंधर में भी खतरा बढ़ गया है. सतलुज नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद निचले इलाकों में पानी भरना शुरू हो गया है, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. मिली जानकारी के अनुसार, गिदड़पिंडी- मखू रेलखंड पर बने पुल नंबर 84 पर पानी का स्तर खतरे के निशान के करीब पहुँच गया है

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गौशाला से अस्पताल तक: सेवा ही जीवन

सालों की नौकरी के बाद जब जोशी जी ने रिटायरमेंट ली, तो सोचा था अब परिवार संग सुखमय समय बिताएँगे। लेकिन हकीकत कुछ और थी—अकेलापन और खालीपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। तभी जीवन ने नया मोड़ दिया। पहले गौशाला की सेवा, फिर अस्पताल में मैनेजर की जिम्मेदारी… और यहीं से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी। आज वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं, यह साबित करते हुए कि “रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि नई सुबह की शुरुआत है।”

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“महाकाल” का गर्भगृह आम भक्तों के लिए नहीं खुलेगा

उज्जैन के महाकाल मंदिर के गर्भगृह में आम भक्तों को प्रवेश नहीं मिलेगा. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गर्भगृह में आम भक्तों के प्रवेश पर रोक और वीआईपी श्रद्धालुओं को विशेष अनुमति देने के उज्जैन कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गर्भगृह में किसे प्रवेश मिलेगा, इसका फैसला सिर्फ कलेक्टर ही करेंगे.

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पंजाब: संकट की घड़ी में मसीहा बने सोनू सूद

पंजाब इन दिनों भयंकर बाढ़ की चपेट में है. कई जिले पानी में डूब गए हैं, हज़ारों लोग बेघर हो गए हैं और जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. ऐसे मुश्किल वक्त में अभिनेता और समाजसेवी सोनू सूद एक बार फिर लोगों की मदद के लिए आगे आए हैं.
सोनू सूद, जो खुद पंजाब से हैं, ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुँचाने का काम शुरू कर दिया है. टीम द्वारा भोजन, दवाइयाँ और आश्रय उपलब्ध कराया जा रहा है. बचाव कार्यों में नावों का उपयोग कर कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया है.

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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बदलता गणपति उत्सव : भक्ति से दिखावे तक

गणपति बप्पा मोरया!….

यह जयघोष जब गूंजता है तो वातावरण भक्तिभाव से भर उठता है. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जब 1893 में मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा शुरू की थी, तब इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य था. गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतवासियों को एकजुट करने और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना जगाने का यह एक सशक्त माध्यम बना. उस दौर में गणेशोत्सव ने समाज को जोड़ने, समानता और भाईचारे का संदेश देने का काम किया.

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सितंबर अहा!

सितंबर आते ही ऋतु-संधि का मधुर प्रकाश धरती पर उतर आता है। बरखा की विदाई और शरद की मुस्कान एक साथ झलकने लगती है। खेतों में धान और मक्का लहलहाते हैं, तो आँगनों में गेंदा और कमल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह महीना केवल प्रकृति के बदलते रंगों का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों का भी साक्षी है। पितृपक्ष की श्रद्धा और गणपति का उल्लास, दोनों एक साथ वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं। नीलम-से गगन में पुखराज-सा सूरज चमकता है और मन के आँगन में एक नया उजास जगाता है। सचमुच, सितंबर नवजीवन का संदेश लेकर आता है।

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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अस्तित्व…

अस्तित्व की खोज में वह खुद से बार-बार टकराती है। कभी सपनों में, कभी आकांक्षाओं में, तो कभी शब्दों की परछाइयों में अपने होने का अर्थ तलाशती है। वह अपने भीतर दबे सवालों को सुनती है—”कौन हूँ और क्या हूँ मैं?” और हर बार यह अहसास होता है कि उसका वजूद अभी अधूरा है। यही अधूरापन उसे फिर से जगाता है, नव-कोंपलों-सा उगाता है। अंततः वह अपने भीतर एक ऐसा वृक्ष देखती है, जो अपनी जड़ों से अनगिनत संभावनाएँ पोषित करता है। यही उसका नया अस्तित्व है—सशक्त, गहन और अडिग।

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अब अहिल्या को राम नहीं मिलते…

पुलिस की रेड पड़ी और इस बार वह पकड़ी गई। थाने में महिला पुलिस फटकार लगा रही थी—”शर्म नहीं आती तुम्हें शरीर बेचते हुए? तुम औरत के नाम पर कलंक हो!” वह सिर नीचा किए सुनती रही। सुन-सुनकर पत्थर हो गई। यह लताड़ पहली बार नहीं पड़ी थी, न जाने कितनी बार लोगों ने उसकी औक़ात उसे दिखाई है। वह यह भी जानती है कि दिन में औक़ात दिखाने वाले, रात में उसके दरवाज़े पर खड़े रहते हैं।

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